तेरा ना होना....


दिखता नहीं मैं रक्तिम,
या शायद समर्थ नहीं तुम,
लाल रंग पहचानने में.

अथवा दोषी मुस्कान है,
जिसे अतीव अनुराग है,
मेरे अधरों से शायद.

जो भी हो वाकई,
दर्द नहीं होता मुझे,
या दर्द खुश हैं शायद.

विषम स्थितियों में मित्र,
तुम्हे मित्र कहना कितना,
आनंद दे जाता है मुझे.

चल पड़ता हूँ मैं,
बाँध आँखों पर पट्टी,
एक पतली डोर पर यूँ.

मानो सपाट हो सड़क,
और मैं हूँ निकला,
साथ तुम्हारे सैर पर.

और अब तुम्हारा ना होना,
है नभ के उड़ने जैसा,
मानो शाश्वत अनिश्चित हुआ.

काश दे जाते तुम धोखा,
कोस तो लेता ह्रदय,
ये टीस तो ना होती.

है अधरों पर मुस्कान नहीं,
खुशियों से बची पहचान नहीं,
अब दर्द बिलखते हैं मेरे.

2 टिप्पणियाँ:

संजय भास्कर said...

बहुत ही अच्‍छी कविता लिखी है
आपने काबिलेतारीफ बेहतरीन


SANJAY KUMAR
HARYANA
http://sanjaybhaskar.blogspot.com

VaRtIkA said...

"दिखता नहीं मैं रक्तिम,
या शायद समर्थ नहीं तुम,
लाल रंग पहचानने में."
waah! kyaa powerful begining hai...

"जो भी हो वाकई,
दर्द नहीं होता मुझे,
या दर्द खुश हैं शायद." ....:) wat a thought... it just left a smile as few tears drops sparkled in eyes...


"और अब तुम्हारा ना होना,
है नभ के उड़ने जैसा,
मानो शाश्वत अनिश्चित हुआ."

bahut bahut bahut hi sunder rachana.... jis tarah se aapne kadi se kadi jodi hai .. kaabil-e- taafeef.... :)