अनुज...


बता के मुझे आदर्श,
महान सा भाई.
नायक न्याय का,
बेहद काबिल बेटा.

सर्वगुण संपन्न,
अत्यंत कुशाग्र.
चपल खिलाड़ी,
सुयोग्य,सुदृढ़ मनुज.

सुमेरु सा अटल,
विन्ध्य सा सुशील.
वशिष्ठ सा ज्ञानी,
दधिची सा पुनीत.

सत्य सारथी,
तर्क युगांधर.
चिर गोस्वामी,
'कैरिकेचर' राम का.

यदा कदा मुझे,
यूँ ही कह जाते हो.
मैं नहीं बन पाता भाई,
तुम बिन कुछ कहे,
भरत-लक्ष्मण बन जाते हो.

1 टिप्पणियाँ:

संजय भास्कर said...

बहुत ही अच्‍छी कविता लिखी है
आपने काबिलेतारीफ बेहतरीन


SANJAY KUMAR
HARYANA
http://sanjaybhaskar.blogspot.com