मैं शब्दचोर हूँ....


ना तो मेरे पास ज्ञान है,
गूंथ-सहेज सकूँ भाव,
ना ही इतना इत्मीनान है.
शिल्प-चातुर्य तनिक नहीं,
इनसे कलम अनजान है.

रखता हूँ दो जेबों में,
छेनी पिता की-माँ की हथौड़ी.
फिरता यहाँ वहाँ हूँ जब,
मिलती है सहूलियत थोड़ी.

छुटके से उसकी पिचकारी,
गुडिया से उसकी किलकारी.
खीज-कुढ़न-थकान,
गोदौलिया-मैदागिन करते,
ऑटोचालकों से.

जलेबी से रस ज़रा,
समोसों से मिर्ची.
खट्टापन यूँ ही किसी,
चाट के ठेले से.

सज्जनों से दुआ,
अंगीठी से धुंआ.
सचिन के शतक का हर्ष,
केमिस्ट्री प्रैक्टिकल का शोक,
शहर के किशोरों से.

उत्सवों से संगीत,
तरुओं से कुछ बीज.
मिटटी थोड़ी खेतों से,
और परम पवित्रता,
महागंगा से.

कभी मांग लेता हूँ,
कभी लेता हूँ चुरा.
क्रिसमस का महीना है,
सोचा कन्फेशन कर लूँ.

4 टिप्पणियाँ:

संजय भास्कर said...

हर शब्‍द में गहराई, बहुत ही बेहतरीन प्रस्‍तुति ।

Sanjay kumar
http://sanjaybhaskar.blogspot.com

संजय भास्कर said...

बहुत खूब .जाने क्या क्या कह डाला इन चंद पंक्तियों में

Sanjay kumar
http://sanjaybhaskar.blogspot.com

VaRtIkA said...

:) pyaaraa saa confession...jeevan ke bahut kareeb ek rachnaa..........

aur yadi aap yeh sab churaate bhi hain to aap shabdchor kahan hue.... bhaavchor hue... kyun?

Avinash Chandra said...

Vartika ji...

Thank u so much for such a sweet comment..

Mere to shabd hi hain...unhe bhaav ho aapke jaise padhne walon ke paas jaa kar banna hota hai.

Shukriya Sanjay ji