युगान्धर...


सुनो!!!
क्या वाकई में तुम,
लौट आये हो,
बन कर दिग्विजयी?
क्या सच में,
किसी ने नहीं थामा,
तुम्हारा अश्वमेघ अभियान?
वाकई में चक्रवर्ती,
बन गए क्या तुम?
क्या वसुन्धरा की,
हर निधि तुम्हारी है?
किसी को भी तुम,
चारण बना सकते हो.
तुम्हारी आज्ञापालन,
धर्म बन गया है.
क्या तुम्हारी सेना,
विराट एवं अजेय है?
बाण तुम्हारे क्या,
वेगवान हैं पवन से?

यही हाँ!!!!
तो सुनो अभिमानी.

जलज-पंकज, पावक-नीर,
लता-पुष्प-परागकण,
किसलयदल तक,
नहीं अधीन तुम्हारे.
मजबूर और चाटुकारों,
की जाति हटा दो.
तो कोई जय तुम्हारे,
नाम की ना उचारे.
नंगे पाँव वट तक आओ,
तो सिखाऊं तुम्हे,
अश्वों की बोली.
तुम्हारे अश्व तक,
हँसते हैं हर प्रहर,
मिथ्या दंभ पर तुम्हारे.

किन्तु यदि तुम्हारा,
उत्तर ना है!!!

तो हे वीरवर!
अखंड तेजवान!
नत हूँ मैं इस,
भाल अरुण पर.
यकीन मानो,
तुम्हारा मौन और स्वर,
तय करते हैं वेग,
जल और अग्नि का.
नीरज-पराग-वल्लरी,
संकल्पित हैं मात्र,
एक मुस्कान पर तुम्हारी.
बैठ विनय की पालकी,
उठ चुके हो तुम,
राज्य देश के ऊपर.
हर सृष्टि कण तुम्हे,
युगान्धर कहता है................

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