मुर्दे..


राग-द्वेष ना इर्ष्या हममे,
तुम सा सड़ा नहीं करते.
एक बार जलते हैं भक से,
नित रोज जला नहीं करते.

कीड़े खा कर खाद बनाएं,
लालच के कोढ़ पडा नहीं करते.
गिद्ध भले ही खा ले कभी,
अपनों से पेट भरा नहीं करते.

शांतचित्त करते हैं साधना,
हवन में होम हुआ नहीं करते.
पुण्य-पाप नहीं गिनते हैं,
ढोंग से अड़ा नहीं करते.

अपने जैसों को ही डराओ,
हम तुमसे डरा नहीं करते.
मौत का डर हो तुम्हे मुबारक,
मुर्दे मरा नहीं करते.

2 टिप्पणियाँ:

संजय भास्कर said...

कम शब्दों में बहुत सुन्दर कविता।
बहुत सुन्दर रचना । आभार

ढेर सारी शुभकामनायें.

SANJAY KUMAR
HARYANA
http://sanjaybhaskar.blogspot.com

Taru said...

shandaar Murde hain bhai.......hehhee.murde ke dil mein ghuske likhne waala tu aur bhi shandar kavi......:):)

Bahut hi badhiyaan Avinash...har chhand pasand aaya....bahut achhi hai creation...:)