दहकते शब्द...


बड़हर* की गाँठ से शब्द,
लिखे नहीं जीवन भर मैंने.
लिखता आया हमेशा ही,
धोती पर हल्दी से पीत शब्द.

उल्टियों की सारी कड़वाहट,
रोके रखी अंतड़ियों में ही.
भेड़िये को उल्टी नहीं होती,
मैं भेड़िया नहीं था पर.

रो देता तो क्या होता,
बढ़ जाता हिन्द का पानी.
आ जाती एक और सुनामी.
डूब जाते कुछ,
सीप=घोंघे-कछुए-लोग.

टूटती चूड़ियों-बर्तनों को,
मैंने नायिका के घुँघरू लिखा.
ठीक है की झूठ लिखा.
पर क्या घुँघरू रोते नहीं?

कितना कहा था दोस्तों,
अंतयेष्टि ना करना मेरी.
किसी बंजर जमीन में,
दफन कर आना मुझे.

सड़ के खाद बनूँ तो,
शायद लहलहाए यहाँ,
हंसी की नई फसल.
जमीन तो तुम्हारी,
यूँ भी किसी काम की नहीं.

पर तुम नहीं माने,
उठा लाये हिन्दू,
और ब्राम्हण बता.
पीले बबूल को ख़रीदा,
चन्दन समझ.

दे दी मुखाग्नि?
मिल गया स्वर्ग मुझे?
जाओ! सब चले जाओ.
सुबह आना.
मेरे शब्द मिलेंगे,
दहकते अंगारों में.

सहेज लेना.
घर में सजा लेना.
मीमांसा करना उनकी.
पर जल जाएँ हाथ,
तुम्हारे बच्चों के.
तो दोष ना देना.
पहले ही सचेता था,
संभला नहीं करते,
आसानी से दहकते शब्द.



बड़हर = एक खट्टा-मीठा पर बेढब गठीला फल है उत्तरप्रदेश-बिहार और बंगाल का.

8 टिप्पणियाँ:

स्वप्निल कुमार 'आतिश' said...

kabhi kabhi tumhari nazmen badi mehnat mangti hain samjh me aane ke liye....fir se padhunga ise... :)

sangeeta swarup said...

ओह....क्या क्या लिख दिया है आज तो....गज़ब की अभिव्यक्ति है...

पर तुम नहीं माने,
उठा लाये हिन्दू,
और ब्राम्हण बता.
पीले बबूल को ख़रीदा,
चन्दन समझ.
****
जाओ! सब चले जाओ.
सुबह आना.
मेरे शब्द मिलेंगे,
दहकते अंगारों में.

****

कितना आक्रोश है और दर्द भी....

roohshine said...

avinash

दे दी मुखाग्नि?
मिल गया स्वर्ग मुझे?
जाओ! सब चले जाओ.
सुबह आना.
मेरे शब्द मिलेंगे,
दहकते अंगारों में.

सहेज लेना.
घर में सजा लेना.
मीमांसा करना उनकी.
पर जल जाएँ हाथ,
तुम्हारे बच्चों के.
तो दोष ना देना.
पहले ही सचेता था,
संभला नहीं करते,
आसानी से दहकते शब्द.

gazab ki abhivyakti hai... shabd nahin is ki tareef ke liye ... hriday mein kuchh dol sa raha hai bas..
god bless u

Neeru said...

उल्टियों की सारी कड़वाहट,
रोके रखी अंतड़ियों में ही

really whaaaaaaaat a thot Avinash motu....ghazab....aisa shayd main kabhi soch hi ni sakti thi.....being a DR bhi mujhe ye achcha laga..:)

टूटती चूड़ियों-बर्तनों को,
मैंने नायिका के घुँघरू लिखा
wowww..khoobsoorat...bahut sunder...

सड़ के खाद बनूँ तो,
शायद लहलहाए यहाँ,
हंसी की नई फसल.

..no words yaar........
दे दी मुखाग्नि?
मिल गया स्वर्ग मुझे?
जाओ! सब चले जाओ.
सुबह आना.
मेरे शब्द मिलेंगे,
दहकते अंगारों में.


bahut bahut bahut hi shandar rachna..ek naya roop tumhara..aakrosh aur bebas saa.....

achcha laga padhna.....

......kabhi kabhi aisa kadva likhna bhi man ko achha lagta hai...loved your this creation.......after rudan sainik ka....Patr vindhya ko..Meri gali....sambandh vichhed....kath ke phool..aur ek aur rachna hai...ab tum hi mujhe chhod do wali...inke sath ye rachna bhi zehan ke hisaar mein qaid hui...

mind blowing...khoob saare mukke tujhe mere fav Sylvester ke...shabaashi waale.....:)

Bless youuu

Avinash Chandra said...

Swapnil bhaiyaa..

jitni baar marzi, utni baar padhein...par kya samajh nahi aaya?

Avinash Chandra said...

Sangeeta ji,

shukriya :)

Avinash Chandra said...

dhanyawad Mudita ji

Avinash Chandra said...

Taru di,

apne itna yaad rakha hai mujhe...:O