मैत्री...


मैं रोष यदि दिखला देता,
हर तर्क में विजय पा लेता.
तो खो देता मैत्री तुमसे,
सह वचनों को झुठला देता.

जो तुमको हर्ष नहीं देता,
मीठा सा स्पर्श नहीं देता.
तो कैसे कहता मित्र तुम्हे,
अनमोल ये जीत गँवा देता.

तुमको विचलित तो कर देता,
मैं बल को चित्रित कर देता.
किन्तु मन कानन ले कर के,
मैं हिय का मोर भुला देता.

मैं तोल पराक्रम तो देता,
विष्णु-शिव तक को भ्रम देता.
किन्तु गँगा को क्या कहता,
इर्ष्या में प्रेम घुला देता.

मैं मित्र से हारा राजा हूँ,
इस स्वर्ग का एक दरवाजा हूँ.
वो धरती मुझको खा जाती,
जो जीत के तुमको पा लेता.

4 टिप्पणियाँ:

स्वप्निल कुमार 'आतिश' said...

dosti aisi hi to hoti hai avi..shandar rachna hai ..

Avinash Chandra said...

Haan bhaiyaa...so to hai :)
shukriya jo aap aaye

VaRtIkA said...

kyaaa baat hai avi... too gud.....

Avinash Chandra said...

shukriya shukriya