आकांक्षा...


स्वेद से लथपथ,
दिन हों मेरे.
दूर हों स्थित,
अगणित प्रतिमान.

वचन स्वयं से,
नींद उड़ा दें.
क्षण की कीमत,
का हो भान.

सांझ के नव,
संकल्प की खातिर.
पास हो मेरे,
"मैं" का ज्ञान.

आए जब आदित्य,
गगन पर.
हाथ उठा कर,
दे सम्मान.

किन्तु धीर,
धरा ना छोड़े.
करे विवेक,
द्रूवा का ध्यान.

7 टिप्पणियाँ:

राजेन्द्र मीणा said...

बहुत ही सुन्दर और भाव पूर्ण रचना है ...अति सुन्दर

sangeeta swarup said...

बहुत खूबसूरत रचना....

संजय भास्कर said...

तारीफ के लिए हर शब्द छोटा है - बेमिशाल प्रस्तुति - आभार.

उम्मेद गोठवाल said...

बेहतरीन शब्द संयोजन के साथ भावों की आकर्षक प्रस्तुति।

Avinash Chandra said...

aap sabhi ka bahut bahut abhaar :)

अनामिका की सदाये...... said...

sunder shabdo se piroyi apki rachna bahut khoobsurt hai.

Avinash Chandra said...

Shukriya Anamika ji :)