मैं-तुम...क्षितिज....

निर्मोही दावानल,
मन का.
जो धीरे धीरे,
रिस जाता.
तो सिक्त प्रेम,
की सेवा में.
पलकों की,
चादर बिछ्वाता.

खुरदरे बाँस के,
पत्तों की.
इक दूरबीन ले,
झूठी सी.
तुमको देखा,
करती आँखें.
कभी थोडा और,
कभी ज्यादा.

केसर लेकर,
अरुणाई से.
तेरा पूछ पता,
पुरवाई से.
मैं खुशबू,
अपने होने की.
गँगा-कवाच,
से भिजवाता.

किन्तु या मधुक्षण,
हो न सका.
लावा गुलाब को,
बो न सका.
अब गरल,
टपकता रहता है.
इन पलकों से,
आधा-आधा.

तुम आत़े तो,
आता सावन.
आषाढ़-जेठ से,
लड़ कर के.
लेकिन हम-तुम,
जो विमुख हुए.
सावन को,
सावन से बाधा.

यह किंचित भी,
इनकार नहीं.
सच! तुममे कोई,
विकार नहीं.
यह समय क्षितिज,
सी बेला है.
आधी धरती,
अम्बर आधा.

7 टिप्पणियाँ:

संजय भास्कर said...

अच्छी लगी आपकी कवितायें - सुंदर, सटीक और सधी हुई।

उम्मेद said...

बेहतरीन शब्द चयन के साथ सुन्दर भावों से सजी सशक्त रचना....बधाई।

रश्मि प्रभा... said...

kuch kuch padhte hue tumko swatah samne dekhti hun aur pahle prishth se padhne lagti hun aur aashish deti hun

स्वप्निल कुमार 'आतिश' said...

main hun tum aur ufaq hai
ye photo jhakkas lagi hai

mujhe to tumhare shabdon pe ashcharya hota hai ..kahaan se le aate ho itne sadhe hue shabd.. koi aasmani granth padhte ho kya..

Avinash Chandra said...

Dhanyawaad aap sabka

Swapnil bhaiya,

Koi granth ya kitaab nahi padhta :P
Waqt hi nahi milta... :P
Haan waqt mile to aasmaan ko padhne ki koshish karta hun...asafal :)

Itni taareef mat kariye, hazam nahi hoti.



Rashmi mausi ji,

aapko kya khaun..??
aashish le lena chahiye na...bina shukriya kiye :)

le liya

Divya said...

sundar rachna !

Avinash Chandra said...

Dhanyawaad Divya ji