आज ही..


आज सब ठीक है.
आज ले लो!
माँग लो लावण्य,
मेरा यौवन.
करूँगा दीक्षित,
निर्धूम स्वच्छ प्रणय से,
स्मिता के साथ.

किन्तु!

एक रोज अकुलाया,
भकुआया सा मेरा,
गोत्र वाष्पित हो,
निकले पोरों से.

और आत्मा का,
लुहार झोंकता हो,
कोयले की चट्टानें,
स्तिमित निरंतर,
हिय की धौंकनी में.

अम्बर की मानिंद,
दृगों के वितान.
जब सूख जाएँ,
भटकटैयों से.
वो भी जाड़ों में,
पाला खाए हुए.

आजानुभुज मेरे,
शर-चाप तो क्या.
सरकंडे उठाते भी,
विस्मृत लगें.

रिमझिम श्रावण भी,
हो जाए भक्क या,
नुकीला तुषार बन,
कंटकाकीर्ण हो.

सुदूर हिमाद्री पर,
आच्छादित श्वेतिमा,
और उस पर झरती,
दिनकर की छटास.

ये भी रस ना दे,
आक्रांत करें.
मानो कोई राजहंस,
मार गिराया हो,
अघोर बहेलिये ने.

मुदित-तिरोहित,
यज्ञ की ऋचाएँ.
और लब्ध मंत्रोच्चार.
जब लगने लगे,
तृषित ढोंग की,
अदम्य यवनिका.

लगा अलक मेरी,
अस्थिविहीन अंगुलियाँ.
बैठें लिखने जब,
स्वेद से ग्रन्थ.

तब न कहना.
उस क्षण मुझे,
कोई भी स्वर-रव,
सुनाई न देगा.

प्रेम-शिखाओं की हरीतिमा,
व सुधांशु के किसलय,
अबूझ होंगे मुझे.

विकट तम से लड़ते,
टूटती धमनियों को,
रण से इतर,
और कुछ भी,
सुझाई न देगा.

9 टिप्पणियाँ:

वन्दना अवस्थी दुबे said...

अरे!! बहुत गम्भीर रचनाएं लिखते हैं आप!! इतनी सी उम्र में इतना गाम्भीर्य! सुन्दर रचना है.

मनोज कुमार said...

एक सच्चे, ईमानदार कवि के मनोभावों का वर्णन। बधाई।

Avinash Chandra said...

Vandana ji,

aap aayin bahut harsh hua.
aapne padha achchha laga

Avinash Chandra said...

Dhanyawaad Manoj ji yahan tak aane ke liye

स्वप्निल कुमार 'आतिश' said...

baap re baap ..... kya ho gaya re avi tumhe...kitni shandaar nazm hai kya kahun .. aur haan .. mujhe pata hai .. tum party to doge nahi ,....invite to karoge nahi par fir bhi ...

"happy bday to uuuuuuu...

happy bday to uuuuuu

happy bday to dear aviiii

happy bday to u...... :)


chal cake wakle kaat liyo ..aur kha lio...

Avinash Chandra said...

lo ji,

kab mana kiya?
kaha kya aisa kuchh?
Apka Avi, apka cake aur apki party, jab kahein , jahan kahein, khidmat me haazir hun main.

Aap aaye achchha laga,
thank u nahi kahunga, aadat nahi hai :)

Avinash Chandra said...

Shandaar nazm.......hmm, kya kahun?

arun c roy said...

pehli rachna "chaubis baras" ke baad ise padhi aur aapke prati najariya hi baal gaya... atyant hi gambhir aur daarshnik andaaj me likhi gai kavita ... bahut umda... aap bahut aage jayen... humari shubhkaamna hai

Avinash Chandra said...

Shukriya Arun ji