क्षणिकाएँ...

एक हफ्ते घर पर रहूँगा..आना जरा कम होगा.. :)


चुभते पन्ने...

डायरी में तहाए,
पन्नों का विष.
याद नहीं किस,
आँख से बहा था.
अब कमबख्त दोनों,
आँखों में चुभता है.




माँ हार जाती है.....

आज फिर से,
हार गई माँ,
बहस में मुझसे.
पापा से, भैया से,
भाभी से, छुटके से,
कल तो गुडिया,
तक से हारी.
फिर मेरे कांच तोड़ने पर,
क्यूँ कहती थीं,
मिसेज दुबे?
जीतना असंभव है आपसे.





नमकीन लाचीदाने...

सुना है रोती थीं,
सोन परियां तो.
बनते थे रोज,
मोती के खजाने.
कल रात छलके,
अम्मा के दो आँसू.
आज प्रसाद में थे,
दो नमकीन लाचीदाने.





पिंजरा...

होता विहग तो,
विचरता स्वछन्द,
करता कलरव,
चूम लेता कभी,
सूरज की लाली.
देखता दूकान में,
टंगा पिंजरा.
और सोचता,
मैं इंसान ही भला था.





नीली कलम....

चोट लगी, लहू जमा,
नीला पड़ गया.
सोचता हूँ जाने,
कलम को कितनी,
चोट लगी होगी.
कितना भी लिखूँ,
लाल ही नहीं होता.








फिर भी काम आऊँगा..

 मेरे अवशेष जला डालो,
और गूंथो मेरी राख तनिक.
दो रोटी उनकी बनवाना,
खा लो तो होगी भूख क्षणिक.





हल्का सा लिखो...

प्रशंसा की चाह में,
क्लिष्ट, अपाच्य रोज,
लिखते हो काहे.
सीखो कुछ कपास से,
फूटो और उड़ो,
बन रुई के फाहे.


3 टिप्पणियाँ:

स्वप्निल कुमार 'आतिश' said...

laachidanon ka zawaab nahi avi ...baki bhi achhi hain ..par lachidane... uffffffffff ...kya likha hai ..hatz offfffff

दिगम्बर नासवा said...

सब की सब लाजवाब ...... ग़ज़ब ....

Avinash Chandra said...

aap logon ko pasand aayin, jaan kar achchha laga