तुम्हारी नज़्म...



भुनभुनाये हुए,
देते हुए गालियाँ.
घसीटते हुए,
जीवन का अर्थशास्त्र ,
ब्रेक इवेन प्वाईंट से ऊपर.
लोग!

गुनगुनाये हुए,
जिससे फूटते हैं बुलबुले,
निकलती है भाप.
बनता है अजनबी अक्स,
पानी से चेहरा धोते.
लोग!

झनझनाए हुए,
थप्पड़ खाए गाल.
दबाये खूब बर्फ़ से,
कि माँ ना जान सके,
परोसते वक़्त रोटियाँ.
लोग!

चरमराये हुए,
कोसते सरकार को.
अधेड़ से तनिक ऊपर,
वृद्धावस्था की तरफ़ दौड़ते,
"पिता " नाम के,
लोग!

सुगबुगाए हुए,
दो चोटियाँ करती लडकियाँ.
जो नहीं चाहतीं,
बिकें कांसे-फूल के कटोरे, 
और करे हाथ पीले,
लोग!

भरभराए हुए,
छत को देखतीं.
सावन सी पनीली आँखें.
कौन 'टपकेगा' पहले,
मैं या तुम तर्क करते,
लोग!

कसमसाये हुए,
चिमटों से दगे पैर.
कि बाबा की आँख लगे,
तो लहरायें कैंची साइकिल,
रहर वाली पगडंडी पर,
लोग!

रात के फुलाये हुए,
चने देख सोचती माँ.
सप्तमी-एकादशी-पूर्णिमा,
रख लूँगी तो खायेंगे,
तीन बार और बच्चे.
लोग!

भले ही ना उतरती हों,
किसी पाणिनि के खाँचे में.
भले ही न छनती हों,
सुर में, लय में, ताल में.

पर इन 'लोगों' में से किसी को,
किसी एक को भी,
हँसा दे, रुला दे.
जगा दे, सुला दे.
कन्धों से पकडे,
हौले से उठा दे.

तो तुम्हारी ये 'चीज',
'नज़्म' हो ना हो,
कामयाब नज़्म है.

22 टिप्पणियाँ:

रश्मि प्रभा... said...

मुझे विश्वास है तुम्हारी, उनकी और अपनी कलम पर
इसकी आग किसी एक को ती हिलाएगी ही ....

संगीता स्वरुप ( गीत ) said...

बहुत सुन्दर .....मन को झकझोर गयी ..

रात के फुलाये हुए,
चने देख सोचती माँ.
सप्तमी-एकादशी-पूर्णिमा,
रख लूँगी तो खायेंगे,
तीन बार और बच्चे.
लोग!

बहुत मार्मिक ..

.तो तुम्हारी ये 'चीज',
'नज़्म' हो ना हो,
कामयाब नज़्म है
तुम्हारी नज़्म कामयाब है

मुदिता said...

अविनाश,
भले ही ना उतरती हों,
किसी पाणिनि के खाँचे में.
भले ही न छनती हों,
सुर में, लय में, ताल में.

पर इन 'लोगों' में से किसी को,
किसी एक को भी,
हँसा दे, रुला दे.
जगा दे, सुला दे.
कन्धों से पकडे,
हौले से उठा दे.

तो तुम्हारी ये 'चीज',
'नज़्म' हो ना हो,
कामयाब नज़्म है.

बिलकुल कामयाब हैं तुम्हारी नज़्में .......शुभकामनाएं

मुदिता said...
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चला बिहारी ब्लॉगर बनने said...

आज आपका नज़्म पढकर मन एतना भावुक हो गए कि हमरे अंदर का कबि जाग गया अऊर ई नज़्म अपने आप लिखा गया. अब आपका जइसा सब्द त नहिंए ला सकते हैं हम, मगर मन का बात एही हैः

क्या कहूँ अविनाश
मेरी नज़्म
जिसपर नाज़ करता था कभी मैं.
भूल कैसे तुम गए वो नज़्म मेरी
जिसको लिखकर मैं हुआ मक़बूल था
कितने इनामों से नवाज़ा था मुझे लोगों ने.
लेकिन भीड़ में लोगों की
कोई लोग मुझको वो नज़र आए नहीं,
वो लोग, जिनका ज़िक्र अपनी नज़्म में
तुमने किया है आज.
और उस नज़्म में
ऐसी कोई भी बात मैंने की नहीं थी
जिसपे कोई हँस दे, या फिर रो दे,
या सो जाए, या फिर जग पड़े
या फिर उठा दे हौले से कंधा पकड़कर
उनको
जो सब चल रहे हैं
इस तुम्हारी नज़्म के हर लफ्ज़ में.
पर आज शर्मिंदा हूँ मैं
अपने लिखे हर लफ्ज़ पर
जिसपर मुझे लोगों ने था ईनाम बख्शा
आके तुम अविनाश
इस कमरे में बिखरी राख को भी देख जाओ
मैंने अपनी नज़्म आतिश के हवाले आज कर दी
क्योंकि मेरी नज़्म वो झूठी थी
बस बाज़ीगरी थी लफ्ज़ की!

मनोज कुमार said...

जीवन की आपाधापी से त्रस्‍त, व्‍यवस्‍था की विसंगतियों से आहत और आंतकित करते परिवेश से आक्रांत मनस्थितियों का कवि ने प्रभावी चित्रण किया है। वह अन्‍योक्ति से एक गहरा संकेत करता है।

प्रवीण पाण्डेय said...

जीवन में विभिन्न अस्थिरताओं को और उनके उपाय को सुन्दरता और भावपूर्ण ढंग से उकेरा है। सुन्दर कृति।

रचना दीक्षित said...

पर इन 'लोगों' में से किसी को,
किसी एक को भी,
हँसा दे, रुला दे.
जगा दे, सुला दे.
कन्धों से पकडे,
हौले से उठा दे.

कितनी खूबसूरती से दिल का दर्द बयां किया है

मनोज कुमार said...

बहुत अच्छी प्रस्तुति।
इसे 01.08.10 की चर्चा मंच में शामिल किया गया है।
http://charchamanch.blogspot.com/

अनामिका की सदायें ...... said...

रात के फुलाये हुए,
चने देख सोचती माँ.
सप्तमी-एकादशी-पूर्णिमा,
रख लूँगी तो खायेंगे,
तीन बार और बच्चे.
लोग!

कितनी सादगी से जिंदगी के हर पहलु को बयान कर लेते हो. बस यही तुम्हारे शब्दों की करामत मुझे मुझे हर पहलु से रु-ब-रु करा जाती है. तो
ये नीचे की पंक्तिया सच में ऐसा ही असर डालती हैं..

पर इन 'लोगों' में से किसी को,
किसी एक को भी,
हँसा दे, रुला दे.
जगा दे, सुला दे.
कन्धों से पकडे,
हौले से उठा दे.

सो ये ही है एक कामयाब नज़्म.

Akhtar Khan Akela said...

bhut khub jnaab nrm grm alfaazon kaa mishrn or hr haalaat ki khubsurtt jivnt mnzr kshi bhut khub bdhaayi ho. akhtar khan akela kota rajsthan

शारदा अरोरा said...

कितना सहज हो कर कह दिया है इतना कुछ ।

Vijay Pratap Singh Rajput said...

बहुत सुंदर जी

Vijay Pratap Singh Rajput said...
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Avinash Chandra said...

आप सभी का बहुत बहुत आभार!

इस स्नेह का..सराहना का, दिए शब्दों का अनदिए शब्दों का भी!

सलिल जी,
कुछ याद आ रहा है जो कभी लिखा था इस कलम ने...

मेरी कलम दवात बचाता,
बढ़ आई नदी पर.
पतवार से लिखता है,
वो सलीके से कुछ शब्द.
मेरी अधूरी सी कविता,
पूछ बैठती है मुझसे.
पाल खेता केवट,
झंकृत सा क्यूँ है?

शुक्रिया आपका!

संगीता स्वरुप ( गीत ) said...

मंगलवार 3 अगस्त को आपकी रचना ... क्षत्रियता चर्चा मंच के साप्ताहिक काव्य मंच पर ली गयी है .कृपया वहाँ आ कर अपने सुझावों से अवगत कराएँ .... आभार

http://charchamanch.blogspot.com/

Saumya said...

i m speechless...this is first time i understood your poem thoroughly...and believe me...it is one of the best i have ever read....wonderful portrayal of 'log'...choti choti baaton ko kitni sahejta se likha hai...it touched deeply!

anupama's sukrity ! said...

अति भावपूर्ण अभिव्यक्ति -
बहुत सुंदर भाव .
बधाई

Avinash Chandra said...

आप सभी का ह्रदय से धन्यवाद.

And Saumya,
Thanks for the kind words..:)

दिगम्बर नासवा said...

बहुत खूब ....

VaRtIkA said...

...............
rulaa diyaa isne to... so ab aapki nazm kaamyaab samjhein.. !

Avinash Chandra said...

:)