नहीं सजे वीणा की तान जो,
बस चढ़ पाए धनुष-बाण जो.
जिन पर नव्या नहीं अघाई,
ऐसे थे चीत्कार के गीत.

जिनमे कल-कल शब्द नहीं थे,
थे सब सुर पर लब्ध नहीं थे.
जिन पर रति नहीं लहराई,
ऐसे थे हाहाकार के गीत.

जो तरुणी के अधर नहीं थे,
जो किंचित भी मधुर नहीं थे.
देख जिन्हें बदली ना छाई,
ऐसे थे दुत्कार के गीत.

भँवरे जिन पर ना बौराए,
किसी शाख भी पुष्प ना आए.
जिन पर मंथर गंगा रोई,
ऐसे थे करुण पुकार के गीत.

देवदत्त जिस दिवस लजाया,
गांडीव में था बोझ समाया.
कालध्वनि थी ऊषा की बोली,
ऐसे थे मेरी ललकार के गीत.

नारायण कीचड़ में उतरा,
पार्थ ने नैतिकता को कुतरा.
था कौन मनीषी सबने देखा,
जब बजे पूर्णटंकार के गीत..

17 टिप्पणियाँ:

Indranil Bhattacharjee ........."सैल" said...

लाजवाब शब्द संयोजन ... बेहतरीन कविता !
आपने तो गीत के असल सार के बारे में लिखा है ... कि जो गीत नहीं है ... फिर गीत कैसा होना चाहिए ...

नारायण कीचड़ में उतरा,
पार्थ ने नैतिकता को कुतरा.
था कौन मनीषी सबने देखा,
जब बजे पूर्णटंकार के गीत..

वाह !

संजय भास्कर said...

गहराई से लिखी गयी एक सुंदर रचना...

संजय भास्कर said...

बहुत दिनों बाद आपके ब्लॉग पार आना हुआ

JHAROKHA said...

avinash ji ,aapki yah rachna marm sparshi hone ke saath hi dil ko jhak jhor jaati hai. bahut behatreen.
poonam

संगीता स्वरुप ( गीत ) said...

वाह....तुम्हारी इस रचना से जैसे कुरुक्षेत्र का मैदान दिख रहा हो...बहुत सुन्दर.....

दिगम्बर नासवा said...

बेहतरीन शब्द संयोजन है इस रचना में .... गहरे भाव भी हैं और आज के समय का रंग भी है ...

Parul said...

ohho ho..wonderful@...keep it up!

संध्या आर्य said...

too good .....

रश्मि प्रभा... said...

कर्ण के कवच की तरह हैं शब्द और भाव ....


नारायण कीचड़ में उतरा,
पार्थ ने नैतिकता को कुतरा.
था कौन मनीषी सबने देखा,
जब बजे पूर्णटंकार के गीत..

मनोज कुमार said...

इसमें वर्णन और विवरण का आकाश नहीं वरन् विश्लेषण, संकेत और व्यंजना से काम चलाया गया है। प्रयुक्त प्रतीक व उपमाएं नए हैं और सटीक भी। आपकी इस कविता में निराधार स्वप्नशीलता और हवाई उत्साह न होकर सामाजिक बेचैनियां और सामाजिक

प्रवीण पाण्डेय said...

आपके ललकार के गीत और उसका उद्गम, दोनो भाया।

रचना दीक्षित said...

नारायण कीचड़ में उतरा,
पार्थ ने नैतिकता को कुतरा.
था कौन मनीषी सबने देखा,
जब बजे पूर्णटंकार के गीत.

क्या खूब लिखा है!!!!!!!!!!!!!!! सुंदर रचना

चला बिहारी ब्लॉगर बनने said...

घुटनअऊर बेचैनी का मनोभाव आप बहुत अच्छा बिम्ब के माध्यम से प्रस्तुत किए हैं... कहाँ नारायण अऊर क्या पार्थ..प्रस्न चिह्न पर समाप्त होने वाला कविता सबसे जवाब के माध्यम से जवाब माँगता है.
अबिनास जी...बस मोह लेते हैं आप सब्द संयोजन से!!

हरकीरत ' हीर' said...

गीत में युद्ध की हाहाकार और धनुष की टंकार है ......

अद्भुत शब्द संयोजन ......!!

संगीता स्वरुप ( गीत ) said...

आपकी यह प्रस्तुति कल २८-७-२०१० बुधवार को चर्चा मंच पर है....आपके सुझावों का इंतज़ार रहेगा ..


http://charchamanch.blogspot.com/

Vivek VK Jain said...

hamesha jaisi ultimate poem.....aap shabd kaha se dhundte h?

Avinash Chandra said...

आप सभी का बहुत आभार!
धन्यवाद संजय जी जो आप आए...

@विवेक,
स्नेह है दोस्त, मेरे शब्दों में ऐसी कोई बात नहीं.. धन्यवाद