सोच...

तुम रघु हो,
मैं अवधेश.
तुम साधारण,
मैं अतिविशेष.
बिन सत्ता के,
राम उपेक्षित.
सोच निराली,
अदभुत देश.

2 टिप्पणियाँ:

संजय भास्कर said...

बहुत खूब, लाजबाब !

venus kesari said...

बिन सत्ता के,
राम उपेक्षित.
सोच निराली,
अदभुत देश

अदभुत