आज ही..


आज सब ठीक है.
आज ले लो!
माँग लो लावण्य,
मेरा यौवन.
करूँगा दीक्षित,
निर्धूम स्वच्छ प्रणय से,
स्मिता के साथ.

किन्तु!

एक रोज अकुलाया,
भकुआया सा मेरा,
गोत्र वाष्पित हो,
निकले पोरों से.

और आत्मा का,
लुहार झोंकता हो,
कोयले की चट्टानें,
स्तिमित निरंतर,
हिय की धौंकनी में.

अम्बर की मानिंद,
दृगों के वितान.
जब सूख जाएँ,
भटकटैयों से.
वो भी जाड़ों में,
पाला खाए हुए.

आजानुभुज मेरे,
शर-चाप तो क्या.
सरकंडे उठाते भी,
विस्मृत लगें.

रिमझिम श्रावण भी,
हो जाए भक्क या,
नुकीला तुषार बन,
कंटकाकीर्ण हो.

सुदूर हिमाद्री पर,
आच्छादित श्वेतिमा,
और उस पर झरती,
दिनकर की छटास.

ये भी रस ना दे,
आक्रांत करें.
मानो कोई राजहंस,
मार गिराया हो,
अघोर बहेलिये ने.

मुदित-तिरोहित,
यज्ञ की ऋचाएँ.
और लब्ध मंत्रोच्चार.
जब लगने लगे,
तृषित ढोंग की,
अदम्य यवनिका.

लगा अलक मेरी,
अस्थिविहीन अंगुलियाँ.
बैठें लिखने जब,
स्वेद से ग्रन्थ.

तब न कहना.
उस क्षण मुझे,
कोई भी स्वर-रव,
सुनाई न देगा.

प्रेम-शिखाओं की हरीतिमा,
व सुधांशु के किसलय,
अबूझ होंगे मुझे.

विकट तम से लड़ते,
टूटती धमनियों को,
रण से इतर,
और कुछ भी,
सुझाई न देगा.

कीकर का फूल...



फूल!
तुम पर तो,
रोज ही आया,
करते हैं ना?
कितने भाई बन्धु,
दोस्त-सखा, सजनी-प्रिया,
हैं परिवार में तुम्हारे.

स्वच्छ वायु,
शीतल परिवेश.
नाना बीज-खाद,
साधन संपन्न,
अगणित चारण,
मालिन-कुम्हारन.
और तो और,
सूर्य की भी सिर्फ,
कोमलांगी पुत्री किरण,
ले पाते हो तुम.

भ्रमर-अलि-पराग,
चींटी-बुलबुल-कोयल.
बिन तौलिये नहाई,
दूब पर बैठे,
कुछ छोटे झींगुर,
तितलियों के संग,
अच्छे दीखते हो तुम.

सच निकुंज!
मैंने सदैव तुम्हारी,
हँसी में हँसी देखी.

और तुम!
बाज नहीं आये,
मेरा माखौल उड़ाने से.

थामो कभी रेत,
जो थमती ही नहीं.
कल्पना करो सिर्फ,
भूखे-रोते गिद्धों,
के सानिध्य की.
जैसे प्लेग के बाद,
किसी रोज केवल,
तुम बचो परिवार में.
और देवगण भी,
छोड़ जाएँ,
तुम्हारे पास,
सूर्य के हठी पुत्र,
महाताप को.

तुम्हारे हर पुष्प-किसलय,
उसी क्षण भस्म ना हों,
सिर्फ सोच कर, तो कहना.

हाँ, निकुंज!
मैं महाबली,
कीकर का फूल,
बोल रहा हूँ.

क्षणिकाएँ...

एक हफ्ते घर पर रहूँगा..आना जरा कम होगा.. :)


चुभते पन्ने...

डायरी में तहाए,
पन्नों का विष.
याद नहीं किस,
आँख से बहा था.
अब कमबख्त दोनों,
आँखों में चुभता है.




माँ हार जाती है.....

आज फिर से,
हार गई माँ,
बहस में मुझसे.
पापा से, भैया से,
भाभी से, छुटके से,
कल तो गुडिया,
तक से हारी.
फिर मेरे कांच तोड़ने पर,
क्यूँ कहती थीं,
मिसेज दुबे?
जीतना असंभव है आपसे.





नमकीन लाचीदाने...

सुना है रोती थीं,
सोन परियां तो.
बनते थे रोज,
मोती के खजाने.
कल रात छलके,
अम्मा के दो आँसू.
आज प्रसाद में थे,
दो नमकीन लाचीदाने.





पिंजरा...

होता विहग तो,
विचरता स्वछन्द,
करता कलरव,
चूम लेता कभी,
सूरज की लाली.
देखता दूकान में,
टंगा पिंजरा.
और सोचता,
मैं इंसान ही भला था.





नीली कलम....

चोट लगी, लहू जमा,
नीला पड़ गया.
सोचता हूँ जाने,
कलम को कितनी,
चोट लगी होगी.
कितना भी लिखूँ,
लाल ही नहीं होता.








फिर भी काम आऊँगा..

 मेरे अवशेष जला डालो,
और गूंथो मेरी राख तनिक.
दो रोटी उनकी बनवाना,
खा लो तो होगी भूख क्षणिक.





हल्का सा लिखो...

प्रशंसा की चाह में,
क्लिष्ट, अपाच्य रोज,
लिखते हो काहे.
सीखो कुछ कपास से,
फूटो और उड़ो,
बन रुई के फाहे.


इन्द्रधनुष का खून..

बादल आये,
आकर छाए.
राह निहारे,
रही धरा.

सब भूरिया कर,
लौटे बादल.
इन्द्रधनुष का,
खून बहा.

पोशम्पा ने,
रात बुहारी.
धान ने खोदी,
खुद ही क्यारी.

दिखा के ठेंगा,
लौटे बादल.
खम्भा बिल्ली के,
नाखून थमा.

जाल तहाए,
मछुआरों ने.
मीनों ने,
ऐय्याशी की.

बाज बने और,
लौटे बादल.
घोंघा हर तट,
रेंग रहा.

जा दुबका हर,
सिंह गुफा में.
दादुर को,
साम्राज्य थमा.

बजा के पोंगा,
लौटे बादल,
नाचे बोलो,
मोर कहाँ?

प्यासी वसुधा,
प्यासे पक्षी.
सूखा किसलय,
बोल रहा.

सूखा सूखा,
छितराया है.
इन्द्रधनुष का,
खून बहा.

मेरे बाद...



आना मिलने,
और इस बार,
हँस देना सच में.

मिलाना हाथ,
और भींच देना,
जोर से, कस के.

ढलकाना आँसू,
पर इस बार,
सच्चे हों, गर्म हों.

रिश्ते की गर्माहट,
एक बार भी,
दिखे तो यहाँ.

मरणोपरांत सही...

जब रक्त जमे,
और गाँठ बने.
सूखे धेले सा,
नस में बहे.

तब भी हे तम,
तुम ना हँसना.
मैं रुधिर में,
आग जला दूँगा.

सब रोम मेरे,
जब सो जाएँ.
स्पंदन और स्पर्श,
भी खो जाएँ.

तब भी बन,
काल नहीं डसना.
मैं गरल को,
मोम बना दूँगा.

मेरी जिव्हा पर,
गीत न हो.
सुर साज रहे,
संगीत न हो.

तुम अट्टहास,
नहीं करना.
मैं तड़ित से,
ताल बना दूँगा.

जो भाल तेज,
से रीता हो.
अनुभव झुर्री,
बन जीता हो.

तुम असि,
हाथ में ना रखना.
अपनी अस्थि से,
वज्र बना दूँगा.

इन लख से,
बहते पारे हों.
जीवन केवट,
सब हारे हों.

भीषण हुंकार,
नहीं भरना.
श्वास से पावक,
बाण चला दूँगा.

जो धरा तनिक,
विचलित सी लगे.
और पग मुझको,
मुझे ही से ठगे.

मुझे जान अचेतन,
अहं नहीं धरना.
मृदा से पाञ्चजन्य,
मैं बना लूँगा.

जो शिशिर रवि,
एक साथ बुझें.
लोचन को मेरे,
कुछ ना सूझे.

मुझको मृत नहीं,
समझ लेना.
तुम्हे आत्मदीप,
से मारूँगा.

चोखा रंग...

रोजनामचा आता है,
शाम साढ़े सात बजे.
और लगभग उसी वक़्त,
हो जाया करते हो,
तुम नितांत निजी.

तुम्हारी चुप सी चुप,
मेरे फटे होंठो से,
झाँकने की तमाम,
कोशिशों में और,
फाड़ देती है उन्हें.

खून रिसता है,
बौखलाया पिनपिनाया सा.
और तुम कह,
देते हो मुझे,
चुपचाप आदमखोर,
खबर बनाने वाले,
खबरिये की तरह.

उस चुप से जूझता,
दौड़ता भागता,
जड़ हो गया हूँ.
और इस मौसम तो,
आये हैं पत्ते भी,
मुझे पर हिना के.

अब भी खबर देखते,
तुम बालकनी से ,
चाय तो नहीं गिराते.

वो चोखा रंग नहीं,
लहू होगा मेरा.