सन्देश प्रकृति का...

भक्क से जल उठो,
हो जाओ सर्द सफ़ेद.
जब चुहचुहा उठे,
पसीना बेतार हो कर.

तब भी हे मनुज,
बने रहना कृपण.
दिखाने मिथ्या मुस्कान,
मरोड़ लेना अपने अधर.

जरुर रखना पैने,
अपने विषाक्त नाखून.
साष्टांग होना दंडवत,
चरण देना चीर पर.

लोलुपता के जीर्ण पात्र में,
आना भिक्षाटन हेतु.
भर लेना रक्त से,
देख तनिक अवसर.

सब कपि के नहीं,
वंशज श्रृगाल के भी हो.
व्यवहार करना नीच तुम,
स्वयं को कहना वीर पर.

और तुमको क्या कहूँ,
शिक्षा कौन सी मैं दूँ. 
खुद को इन्द्रजीत कहना,
इन्द्रीयाँ मेरी जीत कर.

5 टिप्पणियाँ:

रश्मि प्रभा... said...

bahut hi khoobsurat sandesh

sangeeta swarup said...

har pankti se jaise akrosh nikal raha hai...bahut achchhi rachna...thodi vyangatmak shaily liye huye..

रोहित said...

Bahut acchi rachna!

संजय भास्कर said...

रंग बिरंगे त्यौहार होली की रंगारंग शुभकामनाए

शरद कोकास said...

अच्छी कविता है ।