गुलशन.......

ध्वनि...

भीड़ के शोर में,
तनहा फिरता हूँ।
तुम्हे याद करता,
सड़क पार करता हूँ।
टक्कर मार दे,
बस कोई,
मिल जाए यूँ ही,
कहीं मुझे शनि।
के अब सुनाई ना दे,
कोई ध्वनि....

वक़्त....
बेइन्तेहान मजबूर,
पिता कहते हैं।
घबरा मत,
तेरा वक़्त आएगा
"आपका कभी ,
आया क्या पापा?"

प्यार कम नहीं होता.....
पापा नाराज हैं आजकल,
बात नहीं करते मुझसे।
जाने माँ को हर घंटे,
फ़ोन लगा कर कौन देता है।

दूरी.....

तुमसे नौ सौ ,
संतानबे किलोमीटरकी दूरी,
रोज तय करता था।
ख़्वाबों में।
अब दो साल ,
हुए मिले हुए।
तुम ब्याह के,
बगल वाली गली ,
आ गयी हो ना??

कैसे लोग??

ऊँची अट्टालिकाएं,
छोटे लोग।
नोट खरे और,
खोते लोग।
बड़े शहर के ,
गजब के पत्थर,
बड़े गजब के,
होते लोग।


इकलौता वादा...

कब कहा,
मैं पानी पर चल जाऊँगा।
कब कहा,
मैं चाँद तोड़ कर लाऊंगा।
कब कहा,
मैं राह में फूल बिछाउंगा।
कोई वादा तो,
किया नहीं।
के हर ख़ुशी दिलाऊँगा।
पर कभी रोना मत,
दुखी तुम होगे,
अश्क मैं बहाउंगा।


हथेली उनकी...
चार अंगुलियाँ,
चार वेद हैं।
और अंगूठा ,
मेरा है।
मेरे हर छोटे,
पग पग भी।
पिता का साया,
घनेरा है।


सरकारी टीके....

जब कई दिन ,
घर से दूर होता हूँ।
जब मीठे दोस्तों से,
बात नहीं करने पर,
मजबूर होता हूँ।
जब नहीं खा पाता,
बर्फ के गोले।
चावल हाथों से,
अंगुलियाँ चाट के।
तब बचपन याद दिलाते हैं,
कन्धों पर जड़े तीन टीके।
जो हैं मेरे जन्म से,
सरकारी साथी......

6 टिप्पणियाँ:

रश्मि प्रभा said...

तुम्हारी ये शुरुआत कामयाबी के शिखर चूमे
बढ़नेवाले गंदे हाथ सहम जाएँ
बचपन की मोहक बुनियाद हर राह प्रशस्त करे
............
हथेली उनकी...
चार अंगुलियाँ,
चार वेद हैं।
और अंगूठा ,
मेरा है।
मेरे हर छोटे,
पग पग भी।
पिता का साया,
घनेरा है।
ऐसी सुन्दर रचनाएं लिखते रहो

संगीता स्वरुप ( गीत ) said...

बहुत खूबसूरत क्षणिकाएँ हैं ..

संगीता स्वरुप ( गीत ) said...

आपकी किसी नयी -पुरानी पोस्ट की हल चल कल 01-09 - 2011 को यहाँ भी है

...नयी पुरानी हलचल में आज ... दो पग तेरे , दो पग मेरे

S.M.HABIB (Sanjay Mishra 'Habib') said...

मिल जाए यूँ ही,
कहीं मुझे शनि।
के अब सुनाई ना दे,
कोई ध्वनि....

क्या बात है...
सुन्दर क्षणिकाएं...
सादर...

वन्दना said...

सभी रचनाये प्रशंसनीय्।

श्रीप्रकाश डिमरी /Sriprakash Dimri said...

सभी रचनाएँ बेहतरीन ..शुभकामनायें !!!