सहचरी.....

तुम मेरे साथ,
गंगा के किनारे।
घुटने तक पानी,
दीन दुनिया बिसारे।
क्या फर्क पड़ता है,
कोई देखे तो?
किसी की बातें,
रोक तो नहीं सकते।
जब किसी और ने,
अपना नहीं माना।
मेरे धीर को,
बस तुमने पहचाना।
और मैंने भी तो,
तुमसे उतना ही,
प्रेम किया।
सदैव साथ ही,
तो हैं हम।
कितने एक से,
बिम्ब- प्रतिबिम्ब।
एक क्षितिज से,
गंगा गायत्री से।
लगता है न,
हमारा साथ।
युगों-कल्पों के,
हर नियम बंधन के,
पार-अपार है।
मैं ठीक कह रहा हूँ न,
तन्हाई?

1 टिप्पणियाँ:

रश्मि प्रभा said...

तन्हाई जब सहचरी हो तो सच है........कौन क्या कहेगा!
सब अपना है... कमाल की भावना है