धन्यवाद...



विचरूँ कोमल कूजित उपवन,
बरसे मुझ पर सौरभ शत घन,
वहीँ उग आयें वेष्टित तंडुल,
छू जाऊँ मैं क्षिति का जो कण।

श्री मैं ही, मैं ही श्री का मुख,
पाँव पखारें अनुदिन प्रति सुख।
विथकित विन्ध्य-सुमेरु-पखेरू,
देख के मुझको चढ़ता हर क्षण।

ऋतंभरा भूधर सी मेरी,
प्रक्षालित करती हो कीर्ति।
करता केलि तर से तम तक,
मेरे उच्च कर्म का क्रम-क्रम।

सुभट सदय दिव बन चारण गण,
हरित गाछ, मलयज मधु उपवन।
करती हो शोभित अयाल बन,
आरव आरुषी ग्रीवा पर तन।

ऐसे स्वप्न नहीं कब देखे?
इच्छा के जाल नहीं कब फेंके?
है स्वीकार कि तुमसे माँगा,
ये सारा सुख ही रे जीवन!

किन्तु उसका अर्थ यह नहीं,
कि दिन दुर्निवार न लूँगा।
सुख माँगा है तो जो दोगे,
दुःख के दुर्धर उपहार न लूँगा।

मैं तुमसे, यह दृग भी तुम्हारे,
अनुरोध सभी वह्नि में डाले।
विवृत नयन में जो कुछ रख दो,
साथ स्थैर्य के मैं देखूँगा।

विजन पथों की पवन प्रकंपित,
अनुताप बिद्ध, मनः उत्स विरूपित।
विश्रृंखल उर्मियों में दो आज्ञा,
प्रतिक्षण मैं संतरण करूँगा।

दावानल से दहका कानन,
धू-धू करता मधुवन-उपवन, 
सुनी है जो केक-पिक बोली,
गिद्ध-शृगाल सुर भी सुन लूँगा।

तुम अनंत, अनंत की आभा,
निश की ज्योति, प्रात की द्वाभा।
मेरी अस्ति के छोरों का,
तुम ही उपादान रे जीवन!

15 टिप्पणियाँ:

देवेन्द्र पाण्डेय said...

इसे पढ़कर सभी अस्ति अस्ति कहेंगे।

प्रवीण पाण्डेय said...

बहुत ही सुन्दर कविता। शाब्दिक प्रवाह भावों संग दौड़ लगा रहा था।

वन्दना said...

आपकी रचनात्मक ,खूबसूरत और भावमयी
प्रस्तुति भी कल के चर्चा मंच का आकर्षण बनी है
कल (2-5-2011) के चर्चा मंच पर अपनी पोस्ट
देखियेगा और अपने विचारों से चर्चामंच पर आकर
अवगत कराइयेगा और हमारा हौसला बढाइयेगा।

http://charchamanch.blogspot.com/

रचना दीक्षित said...

बहुत सुंदर कविता. शब्दों का आकर्षक प्रयोग.

Smart Indian - स्मार्ट इंडियन said...

मैं भी दोहरा रहा हूँ साथ में।

संगीता स्वरुप ( गीत ) said...

बहुत भावमयी प्रस्तुति

चला बिहारी ब्लॉगर बनने said...

अविनाश जी!
मैं तो जब भी आपकी कविता पढता हूँ, मेरे भीतर वह कविता झंकृत होती सुनाई देती है..अभी तक प्रतिध्वनित हो रही है यह कविता!!

संजय @ मो सम कौन ? said...

इस mode में लिखी कवितायें जब पढ़ने को मिलती हैं तो बहुत चैन मिलताहै।
शुभकामनाएं भविष्य के लिये।

Abhishek Ojha said...

कुछ कहने को नहीं बचता आपकी कविता पढ़. गजब लिखते हैं आप !

rashmi ravija said...

बहुत ही सुन्दर कविता ...शब्दों का प्रवाह बहुत ही आकर्षक और उत्कृष्ट है..
आपकी कविता किसी और दुनिया में ले जाती है....एकदम विशिष्ट अंदाज़ है ,आपका

सुमन'मीत' said...

bahut sundar..khan se late hain ye shabdon ka sailab...

प्रतिभा सक्सेना said...

अंतर तक प्रतिध्वनित करनेवाली कविता .मन आनन्दित हो उठा!

saanjh said...

aviiiiiiiiiiiiii.............kaise hooooooooo......lonnnnnnng time, missed me???

hihi...sorry...yahan aapke baare mein baat kanni hai...ok....

practice nahin rahi....ab aur waqt lagega padhne mein....par as always...padhne mein bohot maza aaya... like a song....samajhne ko samajhte rahenge.....baad mein ;)

प्रतिभा सक्सेना said...

कविता की गहन भावात्मकता में डूब कर ,2 दिन पहले जब पढ़ी कर कुछ व्यक्त करने का भान ही नहीं रहा .आज फिर आई तो याद आया ,पर कुछ कहते फिर भी नहीं बन रहा !
बहुत अर्थमय और गंभीर .साधु !

Avinash Chandra said...

आप सभी का बहुत धन्यवाद