प्रियतम.....

निष् दिन के तुम,

पार हो प्रियतम।

इस जीवन का,

सार हो तुम।

साँसे है पहचान,

तुम्हारी।

धड़कन का,

आधार हो तुम।

संध्या क्षितिज के,

समान मोहक।

कोयल की मधुर,

पुकार हो तुम।

दिनकर की,

उज्जवल आभा हो।

चन्दन की,

शीतलता तुम।

मेरे हिय के,

वासी तुम हो।

मेरे गीत,

मल्हार हो तुम।

मेरे ह्रदय के,

तरुण अरण्य में।

सोंधी मधुर,

बहार हो तुम।

मेरे गीत के,

पाषाणों पर,

सावन की पहली,

झरकार हो तुम.

3 टिप्पणियाँ:

Peehu said...

In this poem,there is great love for not only beloved but for nature also...a love for the every aspect of natural beauty is found in that person who is having the imagination to see lord in nature....truth in beauty...and u have the wisdom to compare nature and human beings....it is great to have such heights of imagination....keep it up dear...

Avinash Chandra said...

thank u so so much

VaRtIkA said...

bahut sunder.............