रात की बातें,
चाँद के हाथों.
अम्बर ने,
भिजवाई थी.

सुबह सूर्य ने,
बातें वापस.
नभ पर ही,
छितराई थी.

चाँद की बोरी,
सूर्य की बोरी.
क्षितिज ने कहीं,
धुलाई थी.

मेरा क्या है,
सब है व्योम का.
मेरी तो तनिक,
लिखाई थी.

स्याही घोली,
जिस पानी में.
वो उसी ताल,
से आई थी.

सन्देश.....


मंदिर के जीने,
की कतारें.
मस्जिद की,
सीढ़ी सी हैं.

रजिया है,
मेरी मुनिया सी.
कैफ की बात,
जिगरी सी है.

मेरे अब्बा,
अकरम के पिताजी.
एक ही शेविंग,
क्रीम लगाते हैं.

रुकुह अता करते,
हैं राम को.
मौला को शीश,
नवाते हैं.

अरुणा आपा,
नर्गिस दीदी.
दोनों का कालेज,
एक ही है.

चार साल से,
बी ए में हैं.
दोनों का नालेज,
एक ही है.

मेरी अम्मी,
सलमा मौसी.
दोनों की रसोई,
जलवा है.

यहाँ पकौडे,
छाने माँ ने.
मौसी ने बनाया,
हलवा है.

मुसलमान का,
मतलब क्या है.
और हिन्दू का,
धर्म है क्या.

इनबातों में,
क्या रक्खा है.
बेफजूल का,
मर्म है क्या.

अश्क चार जब,
मिलें अश्रु को.
आनंद हाथ दे,
जिस रोज लुत्फ़ को.

वो इक पल है,
सौ युग जैसा.
वरना सदियों,
जीवन क्या है.

सुर....


जब सभी वाध्य,
हों यथास्थान.
सुगन्धित इत्र हो,
वायु में घुली.
सुख चारण बन,
पंखा झलें.
रसित ग्रीवा के,
हों मधुर गान.
उन्मादों का,
नाद हो जो.
रति काम का,
थाप हो जो.
मीठी सी जब,
शहनाई हो.
बहती हलकी,
पुरवाई हो.
कुछ धीरे से,
अम्बर छलके.
और पुष्प हिलें,
हलके हलके.
ऐसे सुर प्रभु,
मुझे मत दो.

ये रुधिरों में,
जम जाएँगे.
मेरी ही त्वचा,
को खाएँगे.
जो देना हो,
तो आतप दो.
पछुआ लू की,
सन्नाहट दो.
टनकारें नाम,
करो मेरे.
घनघोर घटा,
गडगडाहट दो.

अरुणाई का,
शंखनाद दो.
संध्या की मुझे,
दुन्दुभी भी दो.
बैलों के गले,
की टन-टन दो.
कभी रंहट की,
खड़-खड़ दो.
घप्प घप्प ,
कुदालों की.
मुझे स्वेद की,
टप-टप दो.

ऐसा सुर मत,
देना मुझको.
जो पौरुष से,
बिलकुल रीता हो.
सुर ऐसा दो,
बन रक्त बहे.
हो महाबली,
पर मीठा हो.

पत्र विन्ध्य को....


महसूस ही नहीं होता,
तुम्हारा होना ना होना.
पठार तक भी तो,
नहीं बचा है तुम्हारा.

सपाट गांगेय मैदानों से,
तनिक ही कठोर हो.
फिर भी गेंहू ना सही,
वृक्ष सानिध्य में हो तुम.

सच ही तो बस,
ऊपर से ही कठोर थे तुम.
पहले भी जब तुमने,
उंचा उठने की हठ की थी.

कितनी सुघढ़ थे तुम,
अकेले दम पर खड़े.
तुम्हे कब चाहिए थी,
श्रृंखलाएं मेरी तरह.

बालक था मैं भैया,
अब समझ पाता हूँ.
जब तुम उठने लगे थे,
सूर्य से भी ऊपर.
वह दंभ-हठ नहीं था,
जम्बुद्वीप बचाया था तुमने.

यों तो ना जा पाता,
मैं तुमसे ऊपर कभी.
तो तुमने ही रचा,
आगमन अगस्त्य का.

तोड़ सकते थे तुम,
वचन अपना किसी क्षण.
परन्तु मनीषियों के देश को,
बचाए रखा तुमने वक्ष पर.

काश तुम उठते भाई,
अगस्त्य वापस ना आयेंगे.
परन्तु नहीं कहूंगा,
तुमसे तोड़ने को मर्यादा.

झुक के चरण छू लूँ,
इतना सामर्थ्य भी नहीं.
समर्पित करता हूँ अश्रु,
चरणों में मानसून भेजा है.

.........आपका अनुज, हिमालय

दो विदा...

अब मत पकडो पतवार मेरी,
धारा को ऊपर आने दो.
अंजुरी से नदी घटेगी नहीं,
मुझको अब डूब ही जाने दो.

मैं नहीं दोष तुमको देता,
ना रोष नियति पर खाता हूँ.
किन्तु अनचाहा गीत सही,
जो बजता है बज जाने दो.

ऐसा तो नहीं की कहा नहीं,
तुमने जो कहा वो सुना नहीं.
किन्तु वायु ही घाती थी,
तो मुझे घात यह खाने दो.

समझो ना है संदेह मुझे,
होने का तुम्हारा अग्निशिखा.
लेकिन मैं कोई दीप नहीं,
हूँ शलभ, भस्म हो जाने दो.

ना रक्त तेरा न रक्तिम हूँ,
ना की मैं धरा पर अंतिम हूँ.
मिल जायेंगे सौ मीत नए,
तेरी अप्रतिम प्रीत को पाने को.

अब अम्बर अम्बुज कहो नहीं,
मुझे सूर्य-ध्रुव का नाम न दो.
ज्योति से पीडा होती है,
मुझे तिमिर में अब घुल जाने दो.

जो कही नहीं तुमने मुझसे,
या कही तो मैंने सुनी नहीं.
ऐसी बातों में क्या रखा,
उन्हें अंतः में सो जाने दो.

यायावर हूँ अज्ञानी हूँ,
अक्खड़ हूँ तनिक अभिमानी हूँ.
अब त्याग कहो या कहो अहं,
मुझे फिर से पथिक हो जाने दो.

मुझे कहे सोना, चाँदी,
राजा बेटा, फूल.
हीरा, मोती, पन्ना,
समझ नहीं पाती है.

जाने कितने दिनों से,
सोच कर रखी.
सहेजी बताने को,
अनजानी बातें अनकही.

जब बैठती है,
जुगाड़ सब लिखने.
दवात कागज़ कलम में,
चेहरा मेरा ही पाती है.

देती है भर भर,
सात आसमान दुआएँ.
लेती है अपने पूरे,
आँचल में बलाएँ.

बात क्या थी,
लिखने बताने को.
सोचना तक भी,
भूल जाती है.

बाबूजी ही मुझे,
लिखा करते हैं चिट्ठियाँ.
छुटके के नखरे,
अम्मा की बतियाँ.

माँ को कागज़,
पूरा नहीं पड़ता.
आँचल पे लिख के,
मेरा आसमान बनाती है.

तुम्हारी कीलें...

बीती बारिश छू कर,
मेरी अँगुलियों को,
जाने कैसा कैसा,
कर दिया था मन.

अंतस तक उतर,
गए थे तुम.
बना लिया था,
घर वहाँ तुमने.

बड़े ठाठ से,
रोज धडकनों पर.
चढ़ कर उतर कर,
आते थे तुम.

और दिन में मैं,
सहेजती थी,
खुशबू तुम्हारी,
आत्मा के आस पास.

ना रहे सुध और,
तकलीफ हो तुम्हे.
बिना साँसों के,
चढ़ने हिय तक.

अपलक कई शामे,
काटी मैंने सावन में.
यकीं मानो फुहार बहार,
सबसे बेखबर.

तुम्हे पलकों से,
आँखों में उतार.
फिर करीने से,
दिल में रखना.

बड़ा पुरसुकून था,
ये सब कुछ ही तो.
तुम भी हमेशा,
खुश ही दिखते थे.

जाने क्यूँ फिर,
उस रोज तुम.
लाये खरीद कुछ,
कीलें संदेह की.

कह देते मुझसे,
रोक के साँसे अपनी,
मैं तान देती नसें,
तुम्हारी अलगनी को.

पर तुमने मर्म को,
एक एक कर,
बेध दिया न,
बिना परवाह किये.

जाना था तो,
चले जाते चुपचाप.
क्या जरुरत थी,
बेध के जाने की.

देखो ना सर्दी में भी,
मैंने दस्ताने नहीं पहने.
शायद आसमान छलके,
शायद तुम आओ...
फिर अंगुलियाँ छूने...