दीदी के लिए

कौन पुण्य जो फल आयी हो?
दीदी तुम जैसे माँ ही हो।
पुलकित ममता का मृदु-पल्लव,
प्रात की पहली सुथराई हो।
       
मेरे अणुओं की शीतलता,
मनः खेचर की तरुणाई हो।
किस दिनकर की प्रखर प्रभा हो?
विभावरी से लड़ आयी हो।
       
शुभ्र दिवस, क्षण हुए सुभीते,
स्नेह कुम्भ तुम, जो ना रीते।
दीप्त तुम ही मेरे ललाट पर,
आँख से तुम ही बह आयी हो।
     
हा दीदी! लिखती हो कैसे?
रोती होगी, मैं अनजान!
बूझ नहीं पाता हूँ जब-तब
क्यों हहरा करते मन-प्राण?
     
आज तुम्हारा पत्र खोल कर,
कर पाता हूँ कुछ अनुमान।
कैसे अश्रु झिपों से झर के,
लिखते होंगे मेरा नाम।
     
भरना दीठ नयन में मेरी,
और विहँस उठना यह जान।
वर्ण-वर्ण पढ़ पत्र तुम्हारा
बिलख रहे हैं मेरे प्राण।
     
हर्ष का यह अतिरेक है दीदी,
जिससे भींजे विह्वल प्राण। 
दिन विशेष की बात नहीं है,
जीवन भर का है अभिमान।

28 टिप्पणियाँ:

अनुपमा पाठक said...

बहुत प्यारी कविता है...!

गिरिजा कुलश्रेष्ठ said...

अपनी दीदी के लिये आपकी यह भावभरी रचना बहुत सच्ची और अच्छी लगी ।

प्रतुल वशिष्ठ said...

आपका शब्द विन्यास अद्भुत है। प्रात की पहली सुथराई और पुलकित ममता का मृदु-पल्लव जैसे भाव मुझे भी सूझते रहे लेकिन जिस सहजता से आप कहते हैं उस सहजता से शायद ही कोई कहे।

पूरी कविता का पठनसुख अवर्णनीय है। इस वर्ष में पहली कविता पढ़ी है अविनाश जी। आपको पढ़ना अलौकिक आनंद देता है।

संजय @ मो सम कौन... said...

जय हो दीदी के भैया की और उससे पहले और उससे ज्यादा जय हो तुम्हारी दीदी की जो तुम्हें नींद से जगाई।

प्रतिभा सक्सेना said...

लंबी अवधि के बाद, दीदी के नेह से खिंच कर लौट आया जो आत्म-निष्कासित भाई, ब्लाग जगत में उसका स्वागत है!

महेन्द्र श्रीवास्तव said...

बहुत सुंदर
अच्छी रचना

संगीता स्वरुप ( गीत ) said...

बहुत डीनो बाद तुमने कुछ पोस्ट किया है .... बहुत सुंदर भाव इस रचना के .... दीदी के प्रति स्नेह छलका पड़ रहा है ।

Archana Chaoji said...

बहुत अच्छा लगा , तुम्हारा लिखते रहना जरूरी है ... स्नेहाशीष ...

दिगम्बर नासवा said...

आज तुम्हारा पत्र खोल कर,
कर पाता हूँ कुछ अनुमान।
कैसे अश्रु झिपों से झर के,
लिखते होंगे मेरा नाम। ...

बहन के प्रेम को अनूठे शब्दों में ढालने की कला ... आपकी रचनाएं हमेशा ही आलोकिक अनुभव लिए होती हैं ... ये रचना भी उसकी एक कड़ी है ...

वाणी गीत said...

बहुत प्यारा गीत। दीदी की इतनी मनुहार के बाद बनता तो है !!

Himanshu Pandey said...

वाह प्यारे! अद्भुत!

प्रवीण पाण्डेय said...

बहुत ही प्यारी और कोमल कविता।

Abhishek Ojha said...

टिपण्णी… आप की तरह भावनाओं को शब्द देना आता तो कुछ कहता !

Neeraj Neer said...

बहुत सुन्दर अभिव्यक्ति .. आपकी इस रचना के लिंक की प्रविष्टी सोमवार (26.08.2013) को ब्लॉग प्रसारण पर की जाएगी, ताकि अधिक से अधिक लोग आपकी रचना पढ़ सकें . कृपया पधारें .

Smart Indian said...

अति सुन्दर!

दीपक बाबा said...

प्यार भरी सुन्दर अभिव्यक्ति

Rajendra Swarnkar : राजेन्द्र स्वर्णकार said...



☆★☆★☆

पुलकित ममता का मृदु-पल्लव, प्रात की पहली सुथराई हो।
मेरे अणुओं की शीतलता, मनः खेचर की तरुणाई हो।
दीप्त तुम ही मेरे ललाट पर, आँख से तुम ही बह आयी हो।

वर्ण-वर्ण पढ़ पत्र तुम्हारा बिलख रहे हैं मेरे प्राण।
हर्ष का यह अतिरेक है दीदी, जिससे भींजे विह्वल प्राण।
दिन विशेष की बात नहीं है, जीवन भर का है अभिमान।

आऽहऽऽ…!
कुछ अनुभूतियों , कुछ रिश्तों , कुछ अभिव्यक्तियों को उनकी विराटता के कारण व्यष्टि के वर्तुल में रखना संभव नहीं होता...

आपकी यह रचना भी ऐसी ही प्रतीत होती है बंधुवर अविनाश चंद्र जी !
सुंदर रचना के लिए आभार !

चलता रहे अनवरत उत्कृष्ट लेखन...
हार्दिक मंगलकामनाओं सहित...
-राजेन्द्र स्वर्णकार

Shilpa Mehta : शिल्पा मेहता said...

wow. beautiful.

ब्लॉग बुलेटिन said...

ब्लॉग बुलेटिन की आज की बुलेटिन ब्लॉग बुलेटिन: कोई दूर से आवाज़ दे चले आओ मे आपकी पोस्ट को भी शामिल किया गया है ... सादर आभार !

vandan gupta said...

सुन्दर भाव

सुशील कुमार जोशी said...

बहुत सुंदर वाह !

देवेन्द्र पाण्डेय said...

कहाँ गायब हो गए भाई?

रश्मि प्रभा... said...

http://bulletinofblog.blogspot.in/2016/09/1.html

अजय कुमार झा said...

"आदरणीय श्रीमान |
सादर अभिवादन | यकायक ही आपकी पोस्ट पर आई इस टिप्पणी का किंचित मात्र आशय यह है कि ये ब्लॉग जगत में आपकी पोस्टों का आपके अनुभवों का , आपकी लेखनी का , कुल मिला कर आपकी प्रतीक्षा कर रहा है , हिंदी के हम जैसे पाठकों के लिए .........कृपया , हमारे अनुरोध पर ..हमारे मनुहार पर ..ब्लोग्स पर लिखना शुरू करें ...ब्लॉगजगत को आपकी जरूरत है ......आपकी अगली पोस्ट की प्रतीक्षा में ...और यही आग्रह मैं अन्य सभी ब्लॉग पोस्टों पर भी करने जा रहा हूँ .....सादर "

अजय कुमार झा said...

हिंदी ब्लॉग जगत को ,आपके ब्लॉग को और आपके पाठकों को आपकी नई पोस्ट की प्रतीक्षा है | आइये न लौट के फिर से कभी ,जब मन करे जब समय मिलते जितना मन करे जितना ही समय मिले | आपके पुराने साथी और नए नए दोस्त भी बड़े मन से बड़ी आस से इंतज़ार कर रहे हैं |

माना की फेसबुक ,व्हाट्सप की दुनिया बहुत तेज़ और बहुत बड़ी हो गयी है तो क्या घर के एक कमरे में जाना बंद तो नहीं कर देंगे न |

मुझे पता है आपने हमने बहुत बार ये कोशिस की है बार बार की है , तो जब बाक़ी सब कुछ नहीं छोड़ सकते तो फिर अपने इस अंतर्जालीय डायरी के पन्ने इतने सालों तक न पलटें ,ऐसा होता है क्या ,ऐसा होना चाहिए क्या |

पोस्ट लिख नहीं सकते तो पढ़िए न ,लम्बी न सही एक फोटो ही सही फोटो न सही एक टिप्पणी ही सही | अपने लिए ,अंतरजाल पर हिंदी के लिए ,हमारे लिए ब्लॉगिंग के लिए ,लौटिए लौटिए कृपया करके लौट आइये

Kapil Rawat said...

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Emily Katie said...

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Unknown said...

अहा!बहुत सुंदर ������ बता नहीं सकता कि कितना आनंद आया पढ़कर ... ऐसा लगा जैसे नेह की शीतल नदी में डुबकी लगा रहा हूँ। वैसे तो मेरी कोई दीदी अर्थात बड़ी बहन नहीं हैं लेकिन अनुमान लगाता हूँ कि अगर होतीं तो शायद कुछ ऐसा ही नेह मुझे भी होता उनसे ... ♥️