अबोले ही..



सूर्य से कंधे मिलातीं,
दूर वह जो चोटियाँ हैं।
पार उनके एक क्षण को,
मैं उतरना चाहता हूँ।

चाहता हूँ खींच डालूँ,
डोर सतरंगी धनुष की।
मैं प्रभा की सीढ़ियों से,
हो उतरना चाहता हूँ।

ग्राम से हेमंत के जो,
निकलती नदी है बारहमासी।
मैं उसी के छोर को,
एक बार छूना चाहता हूँ।

चाहता हूँ हाथ में भरना,
समय की रेत के कण।
मैं उन्हें फिर इस नदी में,
होम करना चाहता हूँ।

रीतते जल के वलय में,
हैं झाँकती मेरुप्रभाएँ।
सीप सम्मोहन विवर सब,
तोड़ देना चाहता हूँ।

चाहता हूँ क्रीक बन कर,
थाम लेना यह सरिता।
मैं समय पर ही समय को,
रोक लेना चाहता हूँ।

मैं बनैली वीथियों से,
श्याम संझा टूटने तक।
लोबान का एक ढेर ऊँचा,
ढूँढ लेना चाहता हूँ।

चाहता हूँ भींज लेना,
ओस की पहली लहर में,
धूम्र में आँसू सुखा के,
धीर धरना चाहता हूँ।

वह कुशलता जो लहर को,
वायु की भांति झुलाए।
नेह के पथ की विमा भी,
ऐसी ही करना चाहता हूँ।

चाहता हूँ भेंट तुमसे,
जो कि है कब से प्रतीक्षित।
ज्योति चुक सकने से पहले,
नेत्र भरना चाहता हूँ।

पात पुरइन के हों फूले,
यूथियाँ भर शाख झूलें।
मय जलज की छोड़ सरसी,
मैं पुष्प किंशुक चाहता हूँ।

चाहता हूँ मैं विजन पर,
एक पग प्रस्थान करना।
और सम पाथेय तुमसे,
'मित्र' सुनना चाहता हूँ।



बीतते क्षणों में...



दे के अपनापन अनोखा,
सीख सौ-सौ काम वाली।
आज जबकि नेह बाँधा,
तुम विदा दे जा रहे हो।

अश्रुओं की लड़ी दे दूँ,
नेह जल की झड़ी दे दूँ।
थाम अंगुलियाँ निहारूँ,
बात कोई बड़ी दे दूँ।

बाँस के दो गोल पत्ते,
मैं फुला के गीत गाऊँ।
लूँ स्तवन में नाम ज्योंकि,
तुम विदा दे जा रहे हो।

साँझ-दिव, प्रति मास के दिन,
झड़ी ठिठुरन ताप के दिन।
तुमने कूची से सँवारे,
कटु निठुर संताप के दिन।

धनुष कितने तुमने बाँधे,
मेघ भर-भर अपने काँधे।
और अब जो रंग फूटे,
तुम विदा दे जा रहे हो।

रात बीती बात बीती,
अर्गला के साथ बीती।
सुभट धीरजधर बने तुम,
सुन सके तुम आपबीती।

और फिर संबल बना के,
सँध से ज्योति दिखा के,
नेत्र में जब प्राण जागा,
तुम विदा दे जा रहे हो।

ठीक तुमने ही तपाया,
किन्तु तुमने कुछ न पाया।
इस हुताशन से निकल के,
मैंने ही वरदान पाया।

धरणी को मंजु बीज दे के,
स्वेद दल की सींच दे के।
अब कुटज जो फूलते हैं,
तुम विदा दे जा रहे हो।

रोक लो पग दर्श ले लूँ,
भाल पर एक स्पर्श ले लूँ।
माँग लूँ कि हर क्षमा अब,
तुमसे उर का हर्ष ले लूँ।

गगन भर आशीष दे के,
वरद मेरे शीश दे के।
स्नेह का प्रतिरूप रख कर,
तुम विदा दे जा रहे हो।

दे विदा भर आँख भींजूँ,
नव के लिए अइपन संवारूँ।
मन्त्र जो तुमने सिखाये,
गीले कंठ से उचारूँ।

यह विदा विस्तार ही है,
नव किरण संचार ही है।
मान मुक्ति का सिखा के,
तुम विदा दे जा रहे हो।




प्रिय ऋतु में...





नियम से नित प्रात!
कौन जाता है छींट?
स्वर्ण भस्म भर शत घट,
व्योम के पूर्वी छोर सुदूर।

कौन टेकता है छड़ी,
ध्रुवनंदा की पीठ पर?
और छिटक आती हैं बूँदें,
चंचल निष्छल स्वछंद।


कौन देता है फूंक,
किंशुक किंकिणियों में प्राण?
धर देता है शुचित मेखला,
बनैली धरती पर निचेष्ट।

कौन बजाता है वीणा,
विहंगो के कलरव की?
औ खोल देता है अनायास,
उनींदे गभुआरे उत्पल दल।

कौन खींचता है नियम से,
मारूति के नव परिपथ?
वानीर झुरमुटों के बीचोंबीच,
यत्र-तत्र काटते पगडंडियों को।


कौन पुरइन पर दधि का,
लेप देता है लगा नित?
ओस की बूँदें छुड़ाती,
जागती हैं रश्मियाँ भी।

कौन गढ़ता अल्पनायें,
पुष्प ला गुलदाउदी के?
किलोल करती वल्लरियाँ हैं,
ठठाती वृन्त-वृन्त, निकुंज भर।

कौन जलाता है हिम बिनौले,
छाजते है ग्राम-घर जो?
कि महि को देखने भर,
ढूंढता है छेद दिनकर।


कौन निश-दिन के यमल को,
प्रेम का जड़ता दिठौना?
बकुचियों के फूलते तन,
आरती में जागते हैं।

कौन करता है विदा दे,
दान-सीधा बादलों को?
कि रजत दल कांपते हैं,
मंदाकिनी की हर लहर पर।



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किंशुक= पलाश
किंकिणियाँ= घुंघरू
मेखला= एक प्रकार का वस्त्र
गभुआरे= कोमल
उत्पल= कमल
पुरइन= कमल का पत्ता
दधि= दही
दिठौना= नज़र से बचने वाला काजल का टीका
बकुचियाँ= औषधीय पौधे

चलो रे पथिक







कौन सी वेला सुखद, विश्राम की- प्रस्थान की है?
कौन सी राशि विहित, संकल्प के अभिधान की है?
कौन से स्वर है सदय, जो करते हैं उद्घोषणा?
कौन सी है रेख जिस तक, नाम अपना अंकना?

मन विचारोगे यही तो, चल न पाओगे यहाँ।
और जिसमे रुक सको, ये यात्रा ऐसी कहाँ?
बाँध लो पाथेय जो भी, हाथ आए ले चलो।
छोड़ दो साथी कहे तो, साथ आए ले चलो।

स्नेह बंधन को स्मृति में, ईश जैसा स्थान दो।
परिचयों की गाँठ खोलो, मुक्ति दे कर मान दो।
और फिर बढ़ते चलो, द्विविधाओं का संपुट खुले।
तुम झड़ो तो योग्य तुमसे, कोई किसलय दल खिले।

तुम नहीं त्राटक, नहीं अंतिम ही कोई पीठ है।
एक बस यह यात्रा है, और पथ यह ढीठ है।
कछार तोड़ो, कूल छोडो, क्रीक पग से नाप लो।
हाथ जोड़ो नद-नदी को, घूँट में या माप लो।

हरे अइपन, घृत, हरीरे,  तोरण- अगरु को भूल लो।
मार्ग काटो स्वत बनैले, करतलों में शूल लो।
ये झुलसते, ये हुलसते, मार्ग सच्चे मीत हैं।
अन्यथा है बाकी सब कुछ, वंचना है, भीत है।

है परिचय, प्रेम भी है, है कि हँसना बोलना।
किन्तु नाप नेह का, प्रतिबन्ध से क्या तोलना?
पग-पग झरें कुसुम जो, प्रेम के वही ललाम हैं।
पग बढें, बढ़ते चलें, ये श्रेष्ठ वर्तमान है।

बाँध देखो कोई भी मिस, पर तुम्हे रुकना नहीं है।
मोह जितना भी लगाओ, युत किसी टिकना नहीं है।
तो क्या तमिस्र और ज्योतित, रात्रि वेला एक है।
पथ वही, पथ की विमा भी, यात्री अकेला एक है।

किरीट-केयूर-मुद्रिका, हैं नाम और सब मोह हैं।
जबकि परिभाषा तुम्हारी, जन्म से ही द्रोह है।
भार उर पर मत ही लादो, ना किसी को और दो।
हास-अश्रु साथ बाँधो, अनुतप्त नौका खोल दो।

कर सकोगे प्राप्त प्रज्ञा, है व्यर्थ ऐसा सोचना।
संजाल से निकल सको, प्रथम यही हो कामना।
सकल सरट-सरीसृपों के, झुण्ड हैं किलोल में।
और बस यही पथ सगा है, अंतर्मन के लोल में।

हों तुमुल स्वर रंध्र से, जो रक्त पीते जा रहे हों।
तप्त मन के उच्छलित क्षण, मन से उलीचे जा रहे हों।
हाथ सारंगी उठा, कोई तार ऐसा तान दो।
कर्ण-कुहर भी तृप्ति पाएँ, उनको ऐसा गान दो।

ये कि पथ ऐसा जो अंतिम, है आदि और अबाध भी।
किस गति से चल रहे, है कितना इसके बाद भी।
मार्ग में हैं पातक-सालक, और गह्वर चण्ड हैं।
इनसे बच गए तो स्व के, विवर महाप्रचण्ड हैं।

शांति है अधिक तो, विहगों में प्रमोद-रव जगाओ।
रोर उठती हो यदि तो, शांति की भेरी बजाओ।
और चल दो मुदित मन कि, मृदुल लहरियाँ बहें।
एक ठांव रुक गए, तो पथिक ही कहाँ रहे।




आगत स्वर..



कितने दिव चले मित्र?
कौन-कौन सी दिशायें नाप,
कौन से दुर्धर विजन पथ माप,
यायावर, लौटे हो इस बार?

तुम्हारे पीछे मैं सहेजता रहा,
तलवों से बन आए गड्ढे।
देखता रहा गूलर के फल।
उनमे चोंच मारते प्रवासी पक्षी।

तुम्हारी प्रतीक्षा में ऊब,
तुम्हारे कौशल विमुग्ध,
छानता रहा सूर्य-शशि,
ताल के तलौंछ में।

बुनता रहा टपकते हरे-पीले,
झरे-टूटे-छूटे पत्तों से शब्द,
सांगोपांग सत्वर तत्पर।

कि तुम लौटोगे बन पाणिनि,
और खींच दोगे उन्हें,
हर खांचे में।
बाँध दोगे हर यवनिका,
कस दोगे मूर्त-अमूर्त हठात,
प्रत्येक निकष पर।

तुम्हारे स्वर नहीं थे,
तो एक अकेला एकांत था,
मेघों के रीते निर्घोषों के बीच,
जो बजता था घनघोर, प्रचंड।

मंदिरों से उठने वाला,
धीमा सा मंत्रोच्चार,
आर्द्र रहा करता था,
ओस की बूँदों से अहर्निश।

तथापि मुकुलित पुहुप धरे,
अक्षरा आस लगाये निःस्व।
मैं करता रहा प्रतीक्षा,
तुम्हारे लौटने की।

कि उत्तर दिशा से लौटोगे तुम,
और होगी गुंजायमान ऋचाओं से,
समस्त धरित्री, सम्पूर्ण शाद्वल वन।

खुल जाएँगे बंध स्वेच्छया,
तुम्हारे श्री दर्शन से।
प्रत्यूष हो उठेगा चटख।
हर्षित उन्मुक्त रश्मिधर!

जो लौट आए हो मित्र!
तो स्वरों को दो आकार।
मौन को कर दो श्राप-मुक्त।
ऋतुओं को करने दो हर्षनाद,
प्रतीक्षा को अपना मोल दो।

पवन में ठीक इसी वेला,
अपने मधुप वर्ण घोल दो।
सब राग स्मिता पाएँ मित्र!
आज पुनः सभी छंद खोल दो।

एकमात्र वर...



हे तात!
आज के दिव ही,
ऐसे ही किसी क्षण,
पुण्य मन, उछाह भर,
ले आए थे तुम,
सैकत कण भर अंजुरी,
ध्रुवनंदा के किनारे से।

हे जननी!
नक्षत्रों के ठीक नीचे,
ऐसी ही किसी वेला,
ढुलका दिया था तुमने,
स्नेह-वात्सल्य से भरा,
प्रथम अजस्र पीयूष घट।

जीव, जीवन, अंश, दर्शन,
सब कार-अकार किये,
तुमसे ही प्राप्त अनुदिन।

विचर सकूँ किसी भी,
प्रकम्पित पथ भयहीन।
न हो सकूँ ग्लानिहत,
म्लान, अधीर, दम्भी।
और रहूँ सदैव प्रणत,
चरणों में अगाध श्रद्धा से।
रचयिता आज फिर से,
मुझे अजर वर यही दो।


संबोधन से परे..







अंशुमाली की प्रथम रश्मियों से,
प्रात वनिता जब धो रही होती है,
झूमते-सरसराते बाँस के झुरमुट।

और बजा रहा होता है कोई घंटा,
उस पार बलुई छोड़ हटान पर बने,
अंजनिकुमार-आजानुभुज के संयुक्त मंदिर में।

निथर आती है जब कठुली भर सुथराई,
तुलसी के हरे-काले प्रत्येक पत्तों पर,
एक समान, एक सी. स्वेच्छया, स्वतः।

तोड़ रही होती हैं उचककर लड़कियाँ,
जब तरोई-सेम-करेले अहाते से,
मुँह पर हाथ धरे खिलखिलाते हुए।

मौन कर मुक्त, उन्मुक्त रंभाती हैं जब गायें,
टुहकनी गौरैया कचरती है टूटे चावल,
गेंहूँ, जौ, दाल कुटुर-कुटुर कट-कट।

पिताजी अगोर रहे होते हैं जब अखबार,
औ' नोचने लगती हैं गिलहरियाँ अमरुद,
माँ को अइपन काढने में व्यस्त देख।

फूल रही होती हैं जब रोटियाँ सुजान आँच पर,
छुआए जा रहे होते हैं दही से लाचीदाने,
सिल घोंट रहा होता है पुदीने में टिकोरे।

कनेर गिरने लगते हैं टप-टपाक जब,
लू टहकार रही होती है शमी, अढ़उल!
धूप खेलती है अकेली ही भर ओसारे।

या धैर्य चुका सनई के खेत जब काटते हैं सूरज,
और भकुआया हुआ वो छींट जाता है,
रात का सहेजा हुआ, भगौना भर जावक।

जोड़े दिन भर की दिहाड़ी, समेटे स्वप्न,
जब लौट रहे होते हैं खेतिहर, विहंग, मजूर।
औ' रूप निहारता कोई जड़ देता है दर्पण को दिठौना।

टिमटिमाते हैं मंगल-ध्रुव, बाबा-नाना,
और बेतों से पीट-पीट करिया देती है,
विधु की पीठ, रजत वेणी वाली बुढ़िया।

जब रात चुप से टपका जाती है अमृत की असंख्य बूँदें,
गभुआरे हरसिंगार गमक उठते हैं सहसा झुण्ड-झुण्ड,
औ टपकन थाम लेती है धरित्री, प्रात से पहले -रवहीन।

ऐसे दीप्त क्षणों के सुभीते हरित निकुंज,
जो उग आता है स्व में, स्व से ही,
होता है प्रस्फुटित, अतल-तल से स्वलक्षण,
निर्मल मनोरम गतिमान अलभ्य,
सुशान्त गरिमामय, स्मितित संस्कार।
आजन्म तुमसे मेरा प्रेम वही हो।



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वनिता= स्त्री
विधु= चन्द्रमा
वेणी= चोटी
जावक= महावर
दिठौना= नज़र से बचाने वाला काजल का टीका