माना तुझमे कर्ण नहीं है,
ना तू शिवी सा दानी है।
लेकिन क्यूँ तू शोक करे रे?
तू भी ब्रम्ह की ही वाणी है।
नीर बहा मत, हे मनु।
सलिल नहीं, वो अमित शांतनु।
व्यर्थ निधि क्यूँ आज करे रे?
कुलपति की कुल निशानी है।
चाक कुम्हार का भले सही है,
मधुरिम कोई मधुरिमा नहीं है।
पर नर क्यूँ संताप धरे रे?
भले न तू चक्रपाणी है।
अलि नहीं है, कली नहीं है।
कंटक क्यारी फली नहीं है।
हा कंटक! क्यूँ जाप करे रे?
महाव्याल भी अनुगामी है।
महाबली तेरी भुजा नहीं है,
ना है शिव, शैलजा नहीं है।
इनके क्यूँ तू ताप जरे रे?
हिमाद्री भी सुमेरु से अनजानी है।
अनय नहीं है, विनय नहीं है।
किसी को तुझसे प्रणय नहीं है।
क्यूँ हर क्षण आलाप करे रे?
सत्य प्रेम तो बलिदानी है।
अश्रु एक दिवस सिन्धु लेगा,
कृष्ण कभी पहिया धरेगा।
सर्पों को दुत्कारे कंटक,
पौरुष का परिचायक सुमेरु।
निंदा भी तो अभिमानी है।
दान का नो हो सामर्थ्य जिसको,
ऐसा कहाँ कोई प्राणी है?
Roaming in the gloom,
over my leprechaun travera,
I could see albatross coming,
flying vast wings from far tundra.
I know its' a sweet chimera.
But I cannot cease reckoning,
this apocryphal vibes,
I had been yearning for,
throughout my lunges,
couple with each of my dives.
The wallops being inseminated,
absymally in my elan vital.
sprut up throbbing,
baking my hysteria to the utter.
I am canting now thee,
come for an interview,
Let me take'em on,
before the next aurora dew.
Its' not a demur,
I'm not confrontin you.
Just aching for an antiphon,
for why I capped only brew.................
जीत ही जाना,
जरुरी तो नहीं।
जरुरी है जीत का,
प्रयास किया जाए।
बिफर तो कोई भी,
सकता है।
जरुरी है जरा,
अपमान पिया जाए।
खुशियों का जश्न,
सब मना लेते हैं।
कभी तसब्वुर में,
किसी ग़मगीन को फूल,
दिया जाए।
अंजुमन के कहकहे,
अच्छे तो लगते हैं।
जरा तन्हाई का,
शोर सुना जाए।
रोज़ उखाड़ते हो,
पंखुडिया गुलाब की।
कभी क्यूँ ना,
कांटें चुने जाएँ।
फिल्म संगीत,
यारों के लतीफे,
छोड़ कर क्यूँ न,
कभी किसी निरीह,
अबोध को सुना जाए।
यूँ तो शहरों में,
मकानों की कमी नहीं।
पर कभी जरा,
अंधियारे बियावान ,
में रहा जाए।
खुशनुमा दोपहरी,
यूँ तो बड़ी हसीन है।
कभी क्यूँ ना,
मौत की रातों,
को जिया जाए.
चार बरस, नहीं!!!
चार बरस, तीन महीने,
बीत गए, उससे मिले।
भूल गया, शायद!!!
नहीं, यकीनन।
हाँ यकीनन।
भूल गया था,
उसके बारे में।
कल अचानक ही,
किसी अपने ने,
यूँ ही कुरेद दिया,
दिल का कोई कोना।
परदे उड़ चले ,
यादों के झरोखों से।
वो याद पर गयी,
बरबस ही आज।
हरिणी सी मासूम आँखें,
बाल जो शायद,
कभी रेशमी रहे हों।
पैरों में चप्पल???
चप्पल नहीं बिवाइयां।
हाय!! नौ साल की,
उम्र में बिवाइयां।
ट्रेन के रुकते ही,
खिड़की के बाहर,
वो मिली, नहीं!!!
उसकी काली सूखी हथेली।
"भैया कुछ खाने,
को दो ना"
मैं नुमाइंदा नहीं,
कोई नेकी का।
पर भाई कहलाना,
बड़ा पसंद है मुझे।
"गुडिया तेरे घर,
कौन कौन है??"
वाह रे!! अभागन से,
उसका घर पूछता है।
" कोई नहीं भैया जी,
माँ मर गयी,
बाप का पता ही नहीं।"
वो मगन थी,
बिस्कुट में थैले में।
क्या कहता,
पूछा"तेरा नाम?"
"आशी भैया॥"
निशब्द मैं था,
के गाडी ने सिग्नल दिया।
"तुझे मतलब पता,
है तेरे नाम का ?"
"नहीं तो, क्या?"
ट्रेन चल पड़ी।
आज भी खुदा से,
एक ही दुआ है।
जब उसे देना,
तो सबसे आखिर में,
आशी का मतलब!!!
कलम लिखती ही,
तब तक है।
के जब तक,
शब्द जिन्दा हैं।
मौत इश्क की,
हुई है बस।
शब्द जरा,
शर्मिन्दा हैं।
वफा...
प्यार जब,
लगने लगा गुनाह सा।
हर लाल फूल,
दिखने लगा स्याह सा।
हमने फोड़ ली आँखें,
वफ़ा को न मरने दिया।
माँ...
पानी पीती हो वही,
रोटियाँ मुझसे एक,
कम ही खाती हो।
रहती हो वहीँ,
उसी गंगा में नहाती हो।
फिर इतना स्नेह कैसे???
इतना प्यार,
कैसे लुटाती हो???
खोखलापन.....
वादी का हर दरख्त,
मुझ सा हो चुका है।
जाने कश्मीर सरकार के,
दीमक रोकथाम अभियान,
को क्या हो गया?
ए बबूल....
आओ भाई,
सुख दुःख बांचें।
सुने तुम्हारी,
कुछ हम उवाचे।
गाँव के बाहर,
अकेले में ज़रा।
अदा....
हमारी हर तन्हाई,
अंजुमन का पता है।
आदत को आदत,
कहना भी तो,
अदा है।
सजदा...
किसी रोज मैं भी,
दवात में पिताजी के,
पैरों की धूल,
भर लाऊंगा।
उस दिन लिखेगी,
कलम महाग्रंथ कोई।
मैं भी वाल्मीकि,
बन जाऊँगा।
विक्रम-बेताल....
माँ बड़ी या बाबूजी??
विक्रम को बेताल ने,
जब फरमाया होगा।
निशब्द हुआ होगा विक्रम,
बेताल उसी रोज़,
पकड़ में आया होगा।
पाकीजापन मेरा....
वो मांगते हैं सुबूत,
मेरी नीयत के पाकीजापन का।
हम उन्हें तुलसी का,
चौरा दिखा पाते हैं बस।
फातिहा.....
मेरी मौत का ,
मातम मत मनाना।
रोना मत कब्र पर,
फूल ना चढाना।
मेरी मौत कोई क़यामत नहीं,
है नए एक जनम का,
फातिहा।
माँ फिर से....
सोचता हूँ प्रेम पर लिखूं,
या लिखूं किसी सुवर्णा पर।
या प्रकृति का गुणगान करूँ,
गीत लिखूं किसी केवट पर।
या दुनिया का हाहाकार लिखूं।
दारुण करूँ कोई पुकार लिखूं?
लेकिन ये कलम तो,
बस तुझसे बंधी है माँ..
ज़रा मिटटी फटती है,
कुछ कांटे चुभते हैं।
माली का पसीना बहता है,
तब जा के कहीं,
कोई फूल खिलता है।
जलन होती है धूप में,
पर होठों पर मुस्कान और,
दिल को सुकून मिलता है।
राह चलते सुबह,
हाथ फेरने से किसी,
गरीब बच्चे के सर,
कुछ जाता नहीं अपना,
वो जरा खिलखिलाता है,
दिल को सुकून मिलता है।
बसों में सीट,
मिल ही जाती है,
पर किसी वृद्ध महिला को,
सीट देने पर।
जब पढ़तीं हैं वो दुआ,
चमक जाती हैं आखें,
दिल को सुकून मिलता है।
बिल्ली के रास्ता,
काट देने पर जब।
खड़ी हो जाती है,
लड़की कोई सरेराह।
उसके सामने से,
गुजर जाने पर।
मरता नहीं मैं बल्कि ,
उसकी आँखों में,
बहन सा प्यार पलता है.
हर रोम पढता है दुआ,
दिल को सुकून मिलता है.
देर हो जाती है,
जब दफ्तर से आते।
और राह पूछते मिलते हैं,
दक्षिण भारतीय सज्जन कोई.
पांच मील और घूमता हूँ,
उन्हें घर पहुँचने को.
क्या हुआ के खुद का दरवाजा,
ज़रा देर से खुलता है.
दिल को सुकून मिलता है.
ढाबे पर कभी लड़का,
गिरा देता है दाल।
"सरदार दाल बड़ी अच्छी है,
एक और भिजवाओ"
कहता हूँ तो लड़का,
कमल के फूल सा खिलता है।
दिल को सुकून मिलता है.
जब कभी अपना कोई,
सूना देता है जली-कटी।
सुन लेता हूँ गीता की तरह,
भले ही वो जीतता है।
मैं हार जाता हूँ पर,
जवाब नहीं देने पर.
दिल को सुकून मिलता है.
जब जब संकट ने जाल बुना,
नर ने पौरुष का वार चुना.
यूँ शय्या पर जी कर क्या हो?
उसने मृत्यु अधिकार चुना.
विद्युत सम तलवार लिए,
तडीतों को अपने तुरीन धरे.
लगा गाँठ जनेऊ में,
भरकर भीषण हुंकार चला.
कितने रत्नाकर लाँघ दिए,
अगणित सेतु भी बाँध दिए.
माँ के वचनों की रक्षा को,
अग्नि में कुंदन लाल जला.
ना विषधर की ही चिंता की,
न सिंहो का सिंहनाद सुना.
जब राह रुकी पर्वत कुचला,
वो वेग पवन का बाँध चला.
ले अक्षय आशीष पितरों का,
और साहस का अधिकार चला.
देखी संकट ने जब ऊष्मा,
हा हा करता चीत्कार जला.
