आयु भर आशीष



झुण्ड से छूटा, साथ से रूठा,
एक था बिचड़ा गिरा यहाँ।
गीति के नवजात शिशु को,
मरने देती क्षिति कहाँ।

पावस में घिर आते शत घन,
बाकि दिव सुथराई के कण।
धमनी-धमनी स्थान रुधिर के,
माँ का संचित नेह बहा।

सूर्य रश्मियाँ पुष्ट बनाती,
विधु की किरणे थीं दुलरातीं।
और मृदुल नभ के तारागण,
हर अठखेली पर मुस्काते।

तृण के नोक ललाट चूमते,
अलि धावन के बाद घूमते।
वल्लरियाँ थीं दीठ बचातीं,
गिरते पर्णों ने मीत कहा।

दिवस बीतते, रात बीतती,
शीतलता औ घाम बीतती।
बालक ने आशीष मान कर,
सबको दे सम्मान सहा।

बारी-बारी सब ऋतुओं ने,
भांति-भांति के पाठ सिखाये।
पराक्रमी कर्ष-मर्ष कौशल पर,
वानीर झुण्ड ने हाथ उठाये।

गभुआरे नन्हे कोमल तन,
को सालस थपकाती गन्धवह।
चीं-चीं मर्मर क्षिप्र ही गढ़ कर,
खग कीटों ने गीत कहा।

खेचर नित आशीष वारते,
गहते हाथ, औ मूंज बाँधते।
"रागों में तुम वीतराग हो!"
"हो अलोल!"- यह बोल उचारते।

मौलसिरी ने आसव छिडका,
नीप-तमाल ने नेह से झिड़का।
आम छोड़ के उतरी कोयल,
कान में गुपचुप प्रीत कहा।

नियति-नटी अपनी गति खेली,
सुभट शाख किंकिणियाँ फूलीं।
जिसने देखा वही अघाया,
"उत्तरीय तुम्हारा स्वर्ण!"- कहा।



*********
बिचड़ा - नन्हा पौधा ;सुथराई - ओस ;रुधिर - रक्त ;विधु - चंद्रमा ;तृण - घास ;गन्धवह - वायु ;खेचर - पक्षी ;किंकिणियाँ - घुंघरू


20 टिप्पणियाँ:

संजय @ मो सम कौन... said...

आयु भर आशीष तो हमेशा से ही है, सुपात्र के लिये क्या अप्राप्य होगा?
वो थोड़ा सा कठिन शब्दों का सरलार्थ भी मिल जाता तो और लाभान्वित होते:)

Smart Indian said...

अति सुन्दर!

देवेन्द्र पाण्डेय said...

अति सुंदर।

कठिन शब्दों के अर्थ भी लिख देते तो पाठकों को सहुलिय होती शब्द सम्राट।

रचना दीक्षित said...

बहुत सुंदर गीत. भाषा की मिठास अतुलनीय है.

बधाई और शुभकामनाएं.

रविकर said...

शब्द-कोष की मदद लेनी पड़ी।
अच्छे भाव -
बधाई एक उत्कृष्ट रचना के लिए ।।
सादर ।।

चला बिहारी ब्लॉगर बनने said...

अद्भुत यात्रा... आशीष शतायुष्य होने का!!

देवेन्द्र पाण्डेय said...

बिचड़ा को मैं बीच समझ रहा था। ..धन्यवाद।

प्रवीण पाण्डेय said...

बार बार पढ़ा, नहीं अघाया..

rashmi ravija said...

बहुत ही प्यारी सी कविता है...

प्रतिभा सक्सेना said...

बिचड़ा के अर्थ मुझे भी नहीं मालूम थे .
प्रकृति सर्वमंगला है !

देवेन्द्र पाण्डेय said...

बीज को बीच लिख दिया था..(:-(

मनोज कुमार said...

बहुत अच्छी रचना लगी।

Abhishek Ojha said...

कुछ कहते नहीं बनता. सहेज लेने का सा मन होता है...

India Darpan said...

बहुत ही बेहतरीन और प्रशंसनीय प्रस्तुति....


इंडिया दर्पण
की ओर से शुभकामनाएँ।

Shanti Garg said...

बहुत बेहतरीन....
मेरे ब्लॉग पर आपका हार्दिक स्वागत है।

Shanti Garg said...

बहुत ही बेहतरीन रचना....
मेरे ब्लॉग

विचार बोध
पर आपका हार्दिक स्वागत है।

प्रसन्नवदन चतुर्वेदी 'अनघ' PBChaturvedi said...

वाह...सुन्दर भावपूर्ण प्रस्तुति...बहुत बहुत बधाई...

देवेन्द्र पाण्डेय said...

बहुत दिनो से कुछ लिखे नहीं। लगता है शब्द सम्राट गूढ़ शब्दों की खोज में लगे हैं।:)

Avinash Chandra said...

ऐसा नहीं है सर!

Anu Shukla said...

बेहतरीन
बहुत खूब!

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